प्रेमचंद
अलग्योझा
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भो
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ला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद
दूसरी सगाई की, तो उसके लड़के रग्घू
के लिए बुरे दिन आ गए। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैने से गॉँव में
गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था। मॉँ के आते ही चक्की में जुतना पड़ा। पन्ना रुपवती
स्त्री थी और रुप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई काम न
करती। गोबर रग्घू निकालता, बैलों को सानी रग्घू
देता। रग्घू ही जूठे बरतन मॉँजता। भोला की ऑंखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे रग्घू में
सब बुराइयॉँ-ही-बुराइयॉँ नजर आतीं। पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार
ऑंखें बंद करके मान लेता था। रग्घू की शिकायतों की जरा परवाह न करता। नतीजा यह हुआ
कि रग्घू ने शिकायत करना ही छोड़ दिया। किसके सामने रोए? बाप ही नहीं, सारा गॉँव उसका दुश्मन था। बड़ा जिद्दी
लड़का है, पन्ना को तो कुद
समझता ही नहीं: बेचारी उसका दुलार करती है,
खिलाती-पिलाती
हैं यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह
तो कहा, पन्ना इतनी सीधी-सादी
है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता!
रग्घू का हृदय मॉँ की ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहां तक कि आठ साठ गुजर गए और
एक दिन भोला के नाम भी मृत्यु का सन्देश आ पहुँचा।
पन्ना
के चार बच्चे थे-तीन बेटे और एक बेटी। इतना बड़ खर्च और कमानेवाला कोई नहीं। रग्घू
अब क्यों बात पूछने लगा? यह मानी हुई बात थी।
अपनी स्त्री लाएगा और अलग रहेगा। स्त्री आकर और भी आग लगाएगी। पन्ना को चारों ओर
अंधेरा ही दिखाई देता था: पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत
बनकर घर में रहेगी। जिस घर में उसने राज किया,
उसमें
अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गुलाम समझा, उसका
मुंह न ताकेगी। वह सुन्दर थीं, अवस्था अभी कुछ ऐसी
ज्यादा न थी। जवानी अपनी पूरी बहार पर थी। क्या वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकती? यहीं न होगा, लोग हँसेंगे। बला से! उसकी बिरादरी में
क्या ऐसा होता नहीं? ब्राह्मण, ठाकुर थोड़ी ही थी कि नाक कट जायगी। यह
तो उन्ही ऊँची जातों में होता है कि घर में चाहे जो कुछ करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को
दिखाकर दूसरा घर कर सकती है, फिर वह रग्घू कि दबैल
बनकर क्यों रहे?
भोला
को मरे एक महीना गुजर चुका था। संध्या हो गई थी। पन्ना इसी चिन्ता में पड़ हुई थी
कि सहसा उसे ख्याल आया, लड़के घर में नहीं
हैं। यह बैलों के लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके
नीचे न आ जाए। अब द्वार पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा? रग्घू को मेरे लड़के फूटी ऑंखों नहीं
भाते। कभी हँसकर नहीं बोलता। घर से बाहर निकली,
तो
देखा, रग्घू सामने झोपड़े
में बैठा ऊख की गँडेरिया बना रहा है, लड़के उसे घेरे खड़े
हैं और छोटी लड़की उसकी गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर
रही है। पन्ना को अपनी ऑंखों पर विश्वास न आया। आज तो यह नई बात है। शायद दुनिया
को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूँ और मन में छुरी रखी हुई है।
घात मिले तो जान ही ले ले! काला सॉँप है, काला सॉँप! कठोर स्वर
में बोली-तुम सबके सब वहॉँ क्या करते हो? घर में आओ, सॉँझ की बेला है, गोरु आते होंगे।
रग्घू
ने विनीत नेत्रों से देखकर कहा—मैं तो हूं ही काकी, डर किस बात का है?
बड़ा
लड़का केदार बोला-काकी, रग्घू दादा ने हमारे
लिए दो गाड़ियाँ बना दी हैं। यह देख, एक पर हम और खुन्नू
बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और
झुनियॉँ। दादा दोनों गाड़ियॉँ खींचेंगे।
यह
कहकर वह एक कोने से दो छोटी-छोटी गाड़ियॉँ निकाल लाया। चार-चार पहिए लगे थे। बैठने
के लिए तख्ते और रोक के लिए दोनों तरफ बाजू थे।
पन्ना
ने आश्चर्य से पूछा-ये गाड़ियॉँ किसने बनाई?
केदार
ने चिढ़कर कहा-रग्घू दादा ने बनाई हैं, और किसने! भगत के घर
से बसूला और रुखानी मॉँग लाए और चटपट बना दीं। खूब दौड़ती हैं काकी! बैठ खुन्नू
मैं खींचूँ।
खुन्नू
गाड़ी में बैठ गया। केदार खींचने लगा। चर-चर शोर हुआ मानो गाड़ी भी इस खेल में
लड़कों के साथ शरीक है।
लछमन
ने दूसरी गाड़ी में बैठकर कहा-दादा, खींचो।
रग्घू
ने झुनियॉँ को भी गाड़ी में बिठा दिया और गाड़ी खींचता हुआ दौड़ा। तीनों लड़के
तालियॉँ बजाने लगे। पन्ना चकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी और सोच रही थी कि य
वही रग्घू है या कोई और।
थोड़ी
देर के बाद दोनों गाड़ियॉँ लौटीं: लड़के घर में जाकर इस यानयात्रा के अनुभव बयान
करने लगे। कितने खुश थे सब, मानों हवाई जहाज पर
बैठ आये हों।
खुन्नू ने कहा-काकी
सब पेड़ दौड़ रहे थे।
लछमन-और
बछियॉँ कैसी भागीं, सबकी सब दौड़ीं!
केदार-काकी, रग्घू दादा दोनों गाड़ियॉँ एक साथ खींच
ले जाते हैं।
झुनियॉँ
सबसे छोटी थी। उसकी व्यंजना-शक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परिमित थी-तालियॉँ
बजा-बजाकर नाच रही थी।
खुन्नू-अब
हमारे घर गाय भी आ जाएगी काकी! रग्घू दादा ने गिरधारी से कहा है कि हमें एक गाय ला
दो। गिरधारी बोला, कल लाऊँगा।
केदार-तीन
सेर दूध देती है काकी! खूब दूध पीऍंगे।
इतने
में रग्घू भी अंदर आ गया। पन्ना ने अवहेलना की दृष्टि से देखकर पूछा-क्यों रग्घू
तुमने गिरधारी से कोई गाय मॉँगी है?
रग्घू
ने क्षमा-प्रार्थना के भाव से कहा-हॉँ, मॉँगी तो है, कल लाएगा।
पन्ना-रुपये
किसके घर से आऍंगे, यह भी सोचा है?
रग्घू-सब
सोच लिया है काकी! मेरी यह मुहर नहीं है। इसके पच्चीस रुपये मिल रहे हैं, पॉँच रुपये बछिया के मुजा दे दूँगा! बस, गाय अपनी हो जाएगी।
पन्ना
सन्नाटे में आ गई। अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार
न कर सका। बोली-मुहर को क्यों बेचे देते हो?
गाय
की अभी कौन जल्दी है? हाथ में पैसे हो जाऍं, तो ले लेना। सूना-सूना गला अच्छा न
लगेगा। इतने दिनों गाय नहीं रही, तो क्या लड़के नहीं
जिए?
रग्घू
दार्शनिक भाव से बोला-बच्चों के खाने-पीने के यही दिन हैं काकी! इस उम्र में न
खाया, तो फिर क्या खाऍंगे।
मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नही मालूम होता। लोग समझते होंगे कि बाप तो गया। इसे
मुहर पहनने की सूझी है।
भोला
महतो गाय की चिंता ही में चल बसे। न रुपये आए और न गाय मिली। मजबूर थे। रग्घू ने
यह समस्या कितनी सुगमता से हल कर दी। आज जीवन में पहली बार पन्ना को रग्घू पर
विश्वास आया, बोली-जब गहना ही
बेचना है, तो अपनी मुहर क्यों
बेचोगे? मेरी हँसुली ले लेना।
रग्घू-नहीं
काकी! वह तुम्हारे गले में बहुत अच्छी लगती है। मर्दो को क्या, मुहर पहनें या न पहनें।
पन्ना-चल, मैं बूढ़ी हुई। अब हँसुली पहनकर क्या
करना है। तू अभी लड़का है, तेरा गला अच्छा न
लगेगा?
रग्घू
मुस्कराकर बोला—तुम अभी से कैसे
बूढ़ी हो गई? गॉँव में है कौन
तुम्हारे बराबर?
रग्घू की सरल आलोचना
ने पन्ना को लज्जित कर दिया। उसके रुखे-मुरछाए मुख पर प्रसन्नता की लाली दौड़ गई।
2
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पाँ
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च साल गुजर गए। रग्घू
का-सा मेहनती, ईमानदार, बात का धनी दूसरा किसान गॉँव में न था।
पन्ना की इच्छा के बिना कोई काम न करता। उसकी उम्र अब 23 साल की हो गई थी। पन्ना
बार-बार कहती, भइया, बहू को बिदा करा लाओ। कब तक नैह में
पड़ी रहेगी? सब लोग मुझी को बदनाम
करते हैं कि यही बहू को नहीं आने देती: मगर रग्घू टाल देता था। कहता कि अभी जल्दी
क्या है? उसे अपनी स्त्री के
रंग-ढंग का कुछ परिचय दूसरों से मिल चुका था। ऐसी औरत को घर में लाकर वह अपनी
शॉँति में बाधा नहीं डालना चाहता था।
आखिर
एक दिन पन्ना ने जिद करके कहा-तो तुम न लाओगे?
‘कह दिया कि अभी कोई जल्दी नहीं।’
‘तुम्हारे लिए जल्दी न होगी, मेरे लिए तो जल्दी है। मैं आज आदमी
भेजती हूँ।’
‘पछताओगी काकी, उसका मिजाज अच्छा नहीं है।’
‘तुम्हारी बला से। जब मैं उससे बोलूँगी
ही नहीं, तो क्या हवा से
लड़ेगी? रोटियॉँ तो बना लेगी।
मुझसे भीतर-बाहर का सारा काम नहीं होता, मैं आज बुलाए लेती
हूँ।’
‘बुलाना चाहती हो, बुला लो: मगर फिर यह न कहना कि यह
मेहरिया को ठीक नहीं करता, उसका गुलाम हो गया।’
‘न कहूँगी, जाकर
दो साड़ियाँ और मिठाई ले आ।’
तीसरे
दिन मुलिया मैके से आ गई। दरवाजे पर नगाड़े बजे, शहनाइयों
की मधुर ध्वनि आकाश में गूँजने लगी। मुँह-दिखावे की रस्म अदा हुई। वह इस मरुभूमि
में निर्मल जलधारा थी। गेहुऑं रंग था, बड़ी-बड़ी नोकीली
पलकें, कपोलों पर हल्की
सुर्खी, ऑंखों में प्रबल
आकर्षण। रग्घू उसे देखते ही मंत्रमुग्ध हो गया।
प्रात:काल
पानी का घड़ा लेकर चलती, तब उसका गेहुऑं रंग
प्रभात की सुनहरी किरणों से कुन्दन हो जाता,
मानों
उषा अपनी सारी सुगंध, सारा विकास और उन्माद
लिये मुस्कराती चली जाती हो।
3
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मु
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लिया मैके से ही जली-भुनी आयी थी। मेरा
शौहर छाती फाड़कर काम करे, और पन्ना रानी बनी
बैठी रहे, उसके लड़े रईसजादे
बने घूमें। मुलिया से यह बरदाश्त न होगा। वह किसी की गुलामी न करेगी। अपने लड़के
तो अपने होते ही नहीं, भाई किसके होते हैं? जब तक पर नहीं निकते हैं, रग्घू को घेरे हुए हैं। ज्यों ही जरा
सयाने हुए, पर झाड़कर निकल
जाऍंगे, बात भी न पूछेंगे।
एक
दिन उसने रग्घू से कहा—तुम्हें इस तरह
गुलामी करनी हो, तो करो, मुझसे न होगी।
रग्घू—तो फिर क्या करुँ, तू ही बता? लड़के तो अभी घर का काम करने लायक भी
नहीं हैं।
मुलिया—लड़के रावत के हैं, कुछ तुम्हारे नहीं हैं। यही पन्ना है, जो तुम्हें दाने-दाने को तरसाती थी। सब
सुन चुकी हूं। मैं लौंडी बनकर न रहूँगी। रुपये-पैसे का मुझे हिसाब नहीं मिलता। न
जाने तुम क्या लाते हो और वह क्या करती है। तुम समझते हो, रुपये घर ही में तो हैं: मगर देख लेना, तुम्हें जो एक फूटी कौड़ी भी मिले।
रग्घू—रुपये-पैसे तेरे हाथ में देने लगूँ तो
दुनिया कया कहेगी, यह तो सोच।
मुलिया—दुनिया जो चाहे, कहे। दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूँ।
देख लेना, भॉँड लीपकर हाथ काला
ही रहेगा। फिर तुम अपने भाइयों के लिए मरो,
मै।
क्यों मरुँ?
रग्घू—ने कुछ जवाब न दिया। उसे जिस बात का भय
था, वह इतनी जल्द सिर आ
पड़ी। अब अगर उसने बहुत तत्थो-थंभो किया, तो साल-छ:महीने और
काम चलेगा। बस, आगे यह डोंगा चलता
नजर नहीं आता। बकरे की मॉँ कब तक खैर मनाएगी?
एक
दिन पन्ना ने महुए का सुखावन डाला। बरसाल शुरु हो गई थी। बखार में अनाज गीला हो
रहा था। मुलिया से बोली-बहू, जरा देखती रहना, मैं तालाब से नहा आऊँ?
मुलिया
ने लापरवाही से कहा-मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो। एक
दिन न नहाओगी तो क्या होगा?
पन्ना
ने साड़ी उतारकर रख दी, नहाने न गयी। मुलिया
का वार खाली गया।
कई
दिन के बाद एक शाम को पन्ना धान रोपकर लौटी,
अँधेरा
हो गया था। दिन-भर की भूखी थी। आशा थी, बहू ने रोटी बना रखी
होगी: मगर देखा तो यहॉँ चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ था, और
बच्चे मारे भूख के तड़प रहे थे। मुलिया से आहिस्ता से पूछा-आज अभी चूल्हा नहीं जला?
केदार
ने कहा—आज दोपहर को भी
चूल्हा नहीं जला काकी! भाभी ने कुछ बनाया ही नहीं।
पन्ना—तो तुम लोगों ने खाया क्या?
केदार—कुछ नहीं, रात
की रोटियॉँ थीं, खुन्नू और लछमन ने
खायीं। मैंने सत्तू खा लिया।
पन्ना—और बहू?
केदार—वह पड़ी सो रह है, कुछ नहीं खाया।
पन्ना
ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गई। आटा गूँधती थी और रोती थी। क्या
नसीब है? दिन-भर खेत में जली, घर आई तो चूल्हे के सामने जलना पड़ा।
केदार
का चौदहवॉँ साल था। भाभी के रंग-ढंग देखकर सारी स्थित समझ् रहा था। बोला—काकी, भाभी
अब तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती।
पन्ना
ने चौंककर पूछा—क्या कुछ कहती थी?
केदार—कहती कुछ नहीं थी: मगर है उसके मन में
यही बात। फिर तुम क्यों नहीं उसे छोड़ देतीं?
जैसे
चाहे रहे, हमारा भी भगवान् है?
पन्ना
ने दॉँतों से जीभ दबाकर कहा—चुप, मरे सामने ऐसी बात भूलकर भी न कहना।
रग्घू तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा बाप है।
मुलिया से कभी बोलोगे तो समझ लेना, जहर खा लूँगी।
4
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द
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शहरे का त्यौहार आया। इस गॉँव से कोस-भर
एक पुरवे में मेला लगता था। गॉँव के सब लड़के मेला देखने चले। पन्ना भी लड़कों के
साथ चलने को तैयार हुई: मगर पैसे कहॉँ से आऍं?
कुंजी
तो मुलिया के पास थी।
रग्घू
ने आकर मुलिया से कहा—लड़के मेले जा रहे
हैं, सबों को दो-दो पैसे
दे दो।
मुलिया
ने त्योरियॉँ चढ़ाकर कहा—पैसे घर में नहीं
हैं।
रग्घू—अभी तो तेलहन बिका था, क्या इतनी जल्दी रुपये उठ गए?
मुलिया—हॉँ,
उठ
गए?
रग्घू—कहॉँ उठ गए? जरा सुनूँ, आज त्योहार के दिन लड़के मेला देखने न
जाऍंगे?
मुलिया—अपनी काकी से कहो, पैसे निकालें, गाड़कर क्या करेंगी?
खूँटी
पर कुंजी हाथ पकड़ लिया और बोली—कुंजी मुझे दे दो, नहीं तो ठीक न होगा। खाने-पहने को भी
चाहिए, कागज-किताब को भी
चाहिए, उस पर मेला देखने को
भी चाहिए। हमारी कमाई इसलिए नहीं है कि दूसरे खाऍं और मूँछों पर ताव दें।
पन्ना
ने रग्घू से कहा—भइया, पैसे क्या होंगे! लड़के मेला देखने न
जाऍंगे।
रग्घू ने झिड़ककर कहा—मेला देखने क्यों न जाऍंगे? सारा गॉँव जा रहा है। हमारे ही लड़के न जाऍंगे?
यह
कहकर रग्घू ने अपना हाथ छुड़ा लिया और पैसे निकालकर लड़कों को दे दिये: मगर कुंजी
जब मुलिया को देने लगा, तब उसने उसे आंगन में
फेंक दिया और मुँह लपेटकर लेट गई! लड़के मेला देखने न गए।
इसके
बाद दो दिन गुजर गए। मुलिया ने कुछ नहीं खाया और पन्ना भी भूखी रही रग्घू कभी इसे
मनाता, कभी उसे:पर न यह उठती, न वह। आखिर रग्घू ने हैरान होकर मुलिया
से पूछा—कुछ मुँह से तो कह, चाहती क्या है?
मुलिया
ने धरती को सम्बोधित करके कहा—मैं कुछ नहीं चाहती, मुझे मेरे घर पहुँचा दो।
रग्घू—अच्छा उठ, बना-खा।
पहुँचा दूँगा।
मुलिया
ने रग्घू की ओर ऑंखें उठाई। रग्घू उसकी सूरत देखकर डर गया। वह माधुर्य, वह मोहकता, वह लावण्य गायब हो गया था। दॉँत निकल
आए थे, ऑंखें फट गई थीं और
नथुने फड़क रहे थे। अंगारे की-सी लाल ऑंखों से देखकर बोली—अच्छा, तो
काकी ने यह सलाह दी है, यह मंत्र पढ़ाया है? तो यहॉँ ऐसी कच्चे नहीं हूँ। तुम दोनों
की छाती पर मूँग दलूँगी। हो किस फेर में?
रग्घू—अच्छा, तो
मूँग ही दल लेना। कुछ खा-पी लेगी, तभी तो मूँग दल
सकेगी।
मुलिया—अब तो तभी मुँह में पानी डालूँगी, जब घर अलग हो जाएगा। बहुत झेल चुकी, अब नहीं झेला जाता।
रग्घू
सन्नाटे में आ गया। एक दिन तक उसके मुँह से आवाज ही न निकली। अलग होने की उसने
स्वप्न में भी कल्पना न की थी। उसने गॉँव में दो-चार परिवारों को अलग होते देखा
था। वह खूब जानता था, रोटी के साथ लोगों के
हृदय भी अलग हो जाते हैं। अपने हमेशा के लिए गैर हो जाते हैं। फिर उनमें वही नाता
रह जाता है, जो गॉँव के आदमियों
में। रग्घू ने मन में ठान लिया था कि इस विपत्ति को घर में न आने दूँगा: मगर
होनहार के सामने उसकी एक न चली। आह! मेरे मुँह में कालिख लगेगी, दुनिया यही कहेगी कि बाप के मर जाने पर
दस साल भी एक में निबाह न हो सका। फिर किससे अलग हो जाऊँ? जिनको गोद में खिलाया, जिनको बच्चों की तरह पाला, जिनके लिए तरह-तरह के कष्ठ झेले, उन्हीं से अलग हो जाऊँ? अपने प्यारों को घर से निकाल बाहर करुँ? उसका गला फँस गया। कॉँपते हुए स्वर में
बोला—तू क्या चाहती है कि
मैं अपने भाइयों से अलग हो जाऊँ? भला सोच तो, कहीं मुँह दिखाने लायक रहूँगा?
मुलिया—तो मेरा इन लोगों के साथ निबाह न होगा।
रग्घू—तो तू अलग हो जा। मुझे अपने साथ क्यों
घसीटती है?
मुलिया—तो मुझे क्या तुम्हारे घर में मिठाई
मिलती है? मेरे लिए क्या संसार
में जगह नहीं है?
रग्घू—तेरी जैसी मर्जी, जहॉँ चाहे रह। मैं अपने घर वालों से अलग
नहीं हो सकता। जिस दिन इस घर में दो चूल्हें जलेंगे, उस
दिन मेरे कलेजे के दो टुकड़े हो जाऍंगे। मैं यह चोट नहीं सह सकता। तुझे जो तकलीफ
हो, वह मैं दूर कर सकता
हूँ। माल-असबाब की मालकिन तू है ही: अनाज-पानी तेरे ही हाथ है, अब रह क्या गया है? अगर कुछ काम-धंधा करना नहीं चाहती, मत कर। भगवान ने मुझे समाई दी होती, तो मैं तुझे तिनका तक उठाने न देता।
तेरे यह सुकुमार हाथ-पांव मेहनत-मजदूरी करने के लिए बनाए ही नहीं गए हैं: मगर क्या
करुँ अपना कुछ बस ही नहीं है। फिर भी तेरा जी कोई काम करने को न चाहे, मत कर: मगर मुझसे अलग होने को न कह, तेरे पैरों पड़ता हूँ।
मुलिया
ने सिर से अंचल खिसकाया और जरा समीप आकर बोली—मैं काम करने से नहीं
डरती, न बैठे-बैठे खाना
चाहती हूँ: मगर मुझ से किसी की धौंस नहीं सही जाती। तुम्हारी ही काकी घर का
काम-काज करती हैं, तो अपने लिए करती हैं, अपने बाल-बच्चों के लिए करती हैं। मुझ
पर कुछ एहसान नहीं करतीं, फिर मुझ पर धौंस
क्यों जमाती हैं? उन्हें अपने बच्चे
प्यारे होंगे, मुझे तो तुम्हारा
आसरा है। मैं अपनी ऑंखों से यह नहीं देख सकती कि सारा घर तो चैन करे, जरा-जरा-से बच्चे तो दूध पीऍं, और जिसके बल-बूते पर गृहस्थी बनी हुई है, वह मट्ठे को तरसे। कोई उसका पूछनेवाला न
हो। जरा अपना मुंह तो देखो, कैसी सूरत निकल आई
है। औरों के तो चार बरस में अपने पट्ठे तैयार हो जाऍंगे। तुम तो दस साल में खाट पर
पड़ जाओगे। बैठ जाओ, खड़े क्यों हो? क्या मारकर भागोगे? मैं तुम्हें जबरदस्ती न बॉँध लूँगी, या मालकिन का हुक्म नहीं है? सच कहूँ, तुम
बड़े कठ-कलेजी हो। मैं जानती, ऐसे निर्मोहिए से
पाला पड़ेगा, तो इस घर में भूल से
न आती। आती भी तो मन न लगाती, मगर अब तो मन तुमसे
लग गया। घर भी जाऊँ, तो मन यहॉँ ही रहेगा
और तुम जो हो, मेरी बात नहीं पूछते।
मुलिया
की ये रसीली बातें रग्घू पर कोई असर न डाल सकीं। वह उसी रुखाई से बोला—मुलिया,
मुझसे यह न होगा। अलग होने का ध्यान करते ही मेरा मन न जाने कैसा हो जाता है। यह
चोट मुझ से न सही जाएगी।
मुलिया
ने परिहास करके कहा—तो चूड़ियॉँ पहनकर
अन्दर बैठो न! लाओ मैं मूँछें लगा लूं। मैं तो समझती थी कि तुममें भी कुछ कल-बल
है। अब देखती हूँ, तो निरे मिट्टी के
लौंदे हो।
पन्ना दालान में खड़ी
दोनों की बातचीत सुन नहीं थी। अब उससे न रहा गया। सामने आकर रग्घू से बोली—जब वह अलग होने पर तुली हुई है, फिर तुम क्यों उसे जबरदस्ती मिलाए रखना
चाहते हो? तुम उसे लेकर रहो, हमारे भगवान् ने निबाह दिया, तो अब क्या डर? अब तो भगवान् की दया से तीनों लड़के
सयाने हो गए हैं, अब कोई चिन्ता नहीं।
रग्घू
ने ऑंसू-भरी ऑंखों से पन्ना को देखकर कहा—काकी, तू भी पागल हो गई है क्या? जानती नहीं, दो रोटियॉँ होते ही दो मन हो जाते हैं।
पन्ना—जब वह मानती ही नहीं, तब तुम क्या करोगे? भगवान् की मरजी होगी, तो कोई क्या करेगा? परालब्ध में जितने दिन एक साथ रहना
लिखा था, उतने दिन रहे। अब
उसकी यही मरजी है, तो यही सही। तुमने
मेरे बाल-बच्चों के लिए जो कुछ किया, वह भूल नहीं सकती।
तुमने इनके सिर हाथ न रखा होता, तो आज इनकी न जाने
क्या गति होती: न जाने किसके द्वार पर ठोकरें खातें होते, न जाने कहॉँ-कहॉँ भीख मॉँगते फिरते।
तुम्हारा जस मरते दम तक गाऊँगी। अगर मेरी खाल तुम्हारे जूते बनाने के काम आते, तो खुशी से दे दूँ। चाहे तुमसे अलग हो
जाऊँ, पर जिस घड़ी पुकारोगे, कुत्ते की तरह दौड़ी आऊँगी। यह भूलकर भी
न सोचना कि तुमसे अलग होकर मैं तुम्हारा बुरा चेतूँगी। जिस दिन तुम्हारा अनभल मेरे
मन में आएगा, उसी दिन विष खाकर मर
जाऊँगी। भगवान् करे, तुम दूधों नहाओं, पूतों फलों! मरते दम तक यही असीस मेरे
रोऍं-रोऍं से निकलती रहेगी और अगर लड़के भी अपने बाप के हैं। तो मरते दम तक
तुम्हारा पोस मानेंगे।
यह
कहकर पन्ना रोती हुई वहॉँ से चली गई। रग्घू वहीं मूर्ति की तरह बैठा रहा। आसमान की
ओर टकटकी लगी थी और ऑंखों से ऑंसू बह रहे थे।
5
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प
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न्ना की बातें सुनकर मुलिया समझ गई कि
अपने पौबारह हैं। चटपट उठी, घर में झाड़ू लगाई, चूल्हा जलाया और कुऍं से पानी लाने चली।
उसकी टेक पूरी हो गई थी।
गॉँव
में स्त्रियों के दो दल होते हैं—एक बहुओं का, दूसरा सासों का! बहुऍं सलाह और
सहानुभूति के लिए अपने दल में जाती हैं, सासें अपने में।
दोनों की पंचायतें अलग होती हैं। मुलिया को कुऍं पर दो-तीन बहुऍं मिल गई। एक से
पूछा—आज तो तुम्हारी
बुढ़िया बहुत रो-धो रही थी।
मुलिया
ने विजय के गर्व से कहा—इतने दिनों से घर की
मालकिन बनी हुई है, राज-पाट छोड़ते किसे
अच्छा लगता है? बहन, मैं उनका बुरा नहीं चाहती: लेकिन एक
आदमी की कमाई में कहॉँ तक बरकत होगी। मेरे भी तो यही खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने के दिन हैं। अभी उनके पीछे मरो, फिर बाल-बच्चे हो जाऍं, उनके पीछे मरो। सारी जिन्दगी रोते ही कट
जाएगी।
एक
बहू-बुढ़िया यही चाहती है कि यह सब जन्म-भर लौंडी बनी रहें। मोटा-झोटा खाएं और
पड़ी रहें।
दूसरी
बहू—किस भरोसे पर कोई मरे—अपने लड़के तो बात नहीं पूछें पराए
लड़कों का क्या भरोसा? कल इनके हाथ-पैर हो
जायेंगे, फिर कौन पूछता है!
अपनी-अपनी मेहरियों का मुंह देखेंगे। पहले ही से फटकार देना अच्छा है, फिर तो कोई कलक न होगा।
मुलिया
पानी लेकर गयी, खाना बनाया और रग्घू
से बोली—जाओं, नहा आओ, रोटी तैयार है।
रग्घू
ने मानों सुना ही नहीं। सिर पर हाथ रखकर द्वार की तरफ ताकता रहा।
मुलिया—क्या कहती हूँ, कुछ सुनाई देता है, रोटी तैयार है, जाओं नहा आओ।
रग्घू—सुन तो रहा हूँ, क्या बहरा हूँ? रोटी तैयार है तो जाकर खा ले। मुझे भूख
नहीं है।
मुलिया
ने फिर नहीं कहा। जाकर चूल्हा बुझा दिया, रोटियॉँ उठाकर छींके
पर रख दीं और मुँह ढॉँककर लेट रही।
जरा
देर में पन्ना आकर बोली—खाना तैयार है, नहा-धोकर खा लो! बहू भी भूखी होगी।
रग्घू
ने झुँझलाकर कहा—काकी तू घर में रहने
देगी कि मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँ? खाना तो खाना ही है, आज न खाऊँगा, कल खाऊँगा, लेकिन अभी मुझसे न खाया जाएगा। केदार
क्या अभी मदरसे से नहीं आया?
पन्ना—अभी तो नीं आया, आता ही होगा।
पन्ना
समझ गई कि जब तक वह खाना बनाकर लड़कों को न खिलाएगी और खुद न खाएगी रग्घू न खाएगा।
इतना ही नहीं, उसे रग्घू से लड़ाई
करनी पड़ेगी, उसे जली-कटी सुनानी
पड़ेगी। उसे यह दिखाना पड़ेगा कि मैं ही उससे अलग होना चाहती हूँ नहीं तो वह इसी
चिन्ता में घुल-घुलकर प्राण दे देगा। यह सोचकर उसने अलग चूल्हा जलाया और खाना
बनाने लगी। इतने में केदार और खुन्नू मदरसे से आ गए। पन्ना ने कहा—आओ बेटा, खा
लो, रोटी तैयार है।
केदार
ने पूछा—भइया को भी बुला लूँ
न?
पन्ना—तुम आकर खा लो। उसकी रोटी बहू ने अलग
बनाई है।
खुन्नू—जाकर भइया से पूछ न आऊँ?
पन्ना—जब उनका जी चाहेगा, खाऍंगे। तू बैठकर खा: तुझे इन बातों से
क्या मतलब? जिसका जी चाहेगा
खाएगा, जिसका जी न चाहेगा, न खाएगा। जब वह और उसकी बीवी अलग रहने
पर तुले हैं, तो कौन मनाए?
केदार—तो क्यों अम्माजी, क्या हम अलग घर में रहेंगे?
पन्ना—उनका जी चाहे, एक घर में रहें, जी चाहे ऑंगन में दीवार डाल लें।
खुन्नू
ने दरवाजे पर आकर झॉँका, सामने फूस की झोंपड़ी
थी, वहीं खाट पर पड़ा
रग्घू नारियल पी रहा था।
खुन्नू— भइया तो अभी नारियल लिये बैठे हैं।
पन्ना—जब जी चाहेगा, खाऍंगे।
केदार—भइया ने भाभी को डॉँटा नहीं?
मुलिया
अपनी कोठरी में पड़ी सुन रही थी। बाहर आकर बोली—भइया
ने तो नहीं डॉँटा अब तुम आकर डॉँटों।
केदार के चेहरे पर रंग उड़ गया। फिर जबान न खोली। तीनों
लड़कों ने खाना खाया और बाहर निकले। लू चलने लगी थी। आम के बाग में गॉँव के
लड़के-लड़कियॉँ हवा से गिरे हुए आम चुन रहे थे। केदार ने कहा—आज हम भी आम चुनने चलें, खूब आम गिर रहे हैं।
खुन्नू—दादा जो बैठे हैं?
लछमन—मैं न जाऊँगा, दादा घुड़केंगे।
केदार—वह तो अब अलग हो गए।
लक्षमन—तो अब हमको कोई मारेगा, तब भी दादा न बोलेंगे?
केदार—वाह, तब क्यों न बोलेंगे?
रग्घू ने तीनों लड़कों को दरवाजे
पर खड़े देखा: पर कुछ बोला नहीं। पहले तो वह घर के बाहर निकलते ही उन्हें डॉँट
बैठता था: पर आज वह मूर्ति के समान निश्चल बैठा रहा। अब लड़कों को कुछ साहस हुआ।
कुछ दूर और आगे बढ़े। रग्घू अब भी न बोला, कैसे बोले? वह सोच रहा था, काकी ने लड़कों को खिला-पिला दिया, मुझसे पूछा तक नहीं। क्या उसकी ऑंखों पर भी परदा पड़ गया है: अगर मैंने लड़कों
को पुकारा और वह न आयें तो?
मैं उनकों मार-पीट तो न
सकूँगा। लू में सब मारे-मारे फिरेंगे। कहीं बीमार न पड़ जाऍं। उसका दिल मसोसकर रह
जाता था, लेकिन मुँह से कुछ कह न सकता था। लड़कों ने देखा कि
यह बिलकुल नहीं बोलते,
तो निर्भय होकर चल पड़े।
सहसा मुलिया ने आकर कहा—अब तो उठोगे कि अब भी नहीं? जिनके नाम पर फाका कर रहे हो, उन्होंने मजे से लड़कों को खिलाया और आप
खाया, अब आराम से सो रही
है। ‘मोर पिया बात न पूछें, मोर सुहागिन नॉँव।’ एक बार भी तो मुँह से न फूटा कि चलो
भइया, खा लो।
रग्घू
को इस समय मर्मान्तक पीड़ा हो रह थी। मुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक
छिड़क दिया। दु:खित नेत्रों से देखकर बोला—तेरी जो मर्जी थी, वही तो हुआ। अब जा, ढोल बजा!
मुलिया—नहीं, तुम्हारे
लिए थाली परोसे बैठी है।
रग्घू—मुझे चिढ़ा मत। तेरे पीछे मैं भी बदनाम
हो रहा हूँ। जब तू किसी की होकर नहीं रहना चाहती, तो
दूसरे को क्या गरज है, जो मेरी खुशामद करे? जाकर काकी से पूछ, लड़के आम चुनने गए हैं, उन्हें पकड़ लाऊँ?
मुलिया
अँगूठा दिखाकर बोली—यह जाता है। तुम्हें
सौ बार गरज हो, जाकर पूछो।
इतने
में पन्ना भी भीतर से निकल आयी। रग्घू ने पूछा—लड़के बगीचे में चले
गए काकी, लू चल रही है।
पन्ना—अब उनका कौन पुछत्तर है? बगीचे में जाऍं, पेड़ पर चढ़ें, पानी में डूबें। मैं अकेली क्या-क्या
करुँ?
रग्घू—जाकर पकड़ लाऊँ?
पन्ना—जब तुम्हें अपने मन से नहीं जाना है, तो फिर मैं जाने को क्यों कहूँ? तुम्हें रोकना होता , तो रोक न देते? तुम्हारे सामने ही तो गए होंगे?
पन्ना
की बात पूरी भी न हुई थी कि रग्घू ने नारियल कोने में रख दिया और बाग की तरफ चला।
6
|
र
|
ग्घू लड़कों को लेकर बाग से लौटा, तो देखा मुलिया अभी तक झोंपड़े में खड़ी
है। बोला—तू जाकर खा क्यों
नहीं लेती? मुझे तो इस बेला भूख
नहीं है।
मुलिया ऐंठकर बोली—हॉँ,
भूख
क्यों लगेगी! भाइयों ने खाया, वह तुम्हारे पेट में
पहुँच ही गया होगा।
रग्घू
ने दॉँत पीसकर कहा—मुझे जला मत मुलिया, नहीं अच्छा न होगा। खाना कहीं भागा नहीं
जाता। एक बेला न खाऊँगा, तो मर न जाउँगा! क्या
तू समझती हैं, घर में आज कोई बात हो
गई हैं? तूने घर में चूल्हा
नहीं जलाया, मेरे कलेजे में आग
लगाई है। मुझे घमंड था कि और चाहे कुछ हो जाए,
पर
मेरे घर में फूट का रोग न आने पाएगा, पर तूने घमंड चूर कर
दिया। परालब्ध की बात है।
मुलिया
तिनककर बोली—सारा मोह-छोह तुम्हीं
को है कि और किसी को है? मैं तो किसी को
तुम्हारी तरह बिसूरते नहीं देखती।
रग्घू
ने ठंडी सॉँस खींचकर कहा—मुलिया, घाव पर नोन न छिड़क। तेरे ही कारन मेरी
पीठ में धूल लग रही है। मुझे इस गृहस्थी का मोह न होगा, तो किसे होगा? मैंने ही तो इसे मर-मर जोड़ा। जिनको गोद
में खेलाया, वहीं अब मेरे
पट्टीदार होंगे। जिन बच्चों को मैं डॉँटता था,
उन्हें
आज कड़ी ऑंखों से भी नहीं देख सकता। मैं उनके भले के लिए भी कोई बात करुँ, तो दुनिया यही कहेगी कि यह अपने भाइयों
को लूटे लेता है। जा मुझे छोड़ दे, अभी मुझसे कुछ न खाया
जाएगा।
मुलिया—मैं कसम रखा दूँगी, नहीं चुपके से चले चलो।
रग्घू—देख,
अब
भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अपना हठ छोड़ दे।
मुलिया—हमारा ही लहू पिए, जो खाने न उठे।
रग्घू
ने कानों पर हाथ रखकर कहा—यह तूने क्या किया
मुलिया? मैं तो उठ ही रहा था।
चल खा लूँ। नहाने-धोने कौन जाए, लेकिन इतनी कहे देता
हूँ कि चाहे चार की जगह छ: रोटियॉँ खा जाऊँ,
चाहे
तू मुझे घी के मटके ही में डुबा दे: पर यह दाग मेरे दिल से न मिटेगा।
मुलिया—दाग-साग सब मिट जाएगा। पहले सबको ऐसा ही
लगता है। देखते नहीं हो, उधर कैसी चैन की वंशी
बज रही है, वह तो मना ही रही थीं
कि किसी तरह यह सब अलग हो जाऍं। अब वह पहले की-सी चॉँदी तो नहीं है कि जो कुछ घर
में आवे, सब गायब! अब क्यों
हमारे साथ रहने लगीं?
रग्घू
ने आहत स्वर में कहा—इसी बात का तो मुझे
गम है। काकी ने मुझे ऐसी आशा न थी।
रग्घू
खाने बैठा, तो कौर विष के
घूँट-सा लगता था। जान पड़ता था, रोटियॉँ भूसी की हैं।
दाल पानी-सी लगती। पानी कंठ के नीचे न उतरता था, दूध
की तरफ देखा तक नहीं। दो-चार ग्रास खाकर उठ आया, जैसे
किसी प्रियजन के श्राद्ध का भोजन हो।
रात
का भोजन भी उसने इसी तरह किया। भोजन क्या किया,
कसम
पूरी की। रात-भर उसका चित्त उद्विग्न रहा। एक अज्ञात शंका उसके मन पर छाई हुई थी, जेसे भोला महतो द्वार पर बैठा रो रहा
हो। वह कई बार चौंककर उठा। ऐसा जान पड़ा, भोला उसकी ओर
तिरस्कार की आँखों से देख रहा है।
वह
दोनों जून भोजन करता था: पर जैसे शत्रु के घर। भोला की शोकमग्न मूर्ति ऑंखों से न
उतरती थी। रात को उसे नींद न आती। वह गॉँव में निकलता, तो इस तरह मुँह चुराए, सिर झुकाए मानो गो-हत्या की हो।
7
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पाँ
|
च साल गुजर गए। रग्घू अब दो लड़कों का
बाप था। आँगन में दीवार खिंच गई थी, खेतों में मेड़ें डाल
दी गई थीं और बैल-बछिए बॉँध लिये गए थे। केदार की उम्र अब उन्नीस की हो गई थी।
उसने पढ़ना छोड़ दिया था और खेती का काम करता था। खुन्नू गाय चराता था। केवल लछमन
अब तक मदरसे जाता था। पन्ना और मुलिया दोनों एक-दूसरे की सूरत से जलती थीं। मुलिया
के दोनों लड़के बहुधा पन्ना ही के पास रहते। वहीं उन्हें उबटन मलती, वही काजल लगाती, वही गोद में लिये फिरती: मगर मुलिया के
मुंह से अनुग्रह का एक शब्द भी न निकलता। न पन्ना ही इसकी इच्छुक थी। वह जो कुछ
करती निर्व्याज भाव से करती थी। उसके दो-दो लड़के अब कमाऊ हो गए थे। लड़की खाना
पका लेती थी। वह खुद ऊपर का काम-काज कर लेती। इसके विरुद्ध रग्घू अपने घर का अकेला
था, वह भी दुर्बल, अशक्त और जवानी में बूढ़ा। अभी आयु तीस
वर्ष से अधिक न थी, लेकिन बाल खिचड़ी हो
गए थे। कमर भी झुक चली थी। खॉँसी ने जीर्ण कर रखा था। देखकर दया आती थी। और खेती
पसीने की वस्तु है। खेती की जैसी सेवा होनी चाहिए, वह
उससे न हो पाती। फिर अच्छी फसल कहॉँ से आती?
कुछ
ऋण भी हो गया था। वह चिंता और भी मारे डालती थी। चाहिए तो यह था कि अब उसे कुछ
आराम मिलता। इतने दिनों के निरन्तर परिश्रम के बाद सिर का बोझ कुछ हल्का होता, लेकिन मुलिया की स्वार्थपरता और
अदूरदर्शिता ने लहराती हुई खेती उजाड़ दी। अगर सब एक साथ रहते, तो वह अब तक पेन्शन पा जाता, मजे में द्वार पर बैठा हुआ नारियल पीता।
भाई काम करते, वह सलाह देता। महतो
बना फिरता। कहीं किसी के झगड़े चुकाता, कहीं साधु-संतों की
सेवा करता: वह अवसर हाथ से निकल गया। अब तो चिंता-भार दिन-दिन बढ़ता जाता था।
आखिर उसे धीमा-धीमा
ज्वर रहने लगा। हृदय-शूल, चिंता, कड़ा परिश्रम और अभाव का यही पुरस्कार
है। पहले कुछ परवाह न की। समझा आप ही आप अच्छा हो जाएगा: मगर कमजोरी बढ़ने लगी, तो दवा की फिक्र हुई। जिसने जो बता दिया, खा लिया, डाक्टरों
और वैद्यों के पास जाने की सामर्थ्य कहॉँ? और सामर्थ्य भी होती, तो रुपये खर्च कर देने के सिवा और नतीजा
ही क्या था? जीर्ण ज्वर की औषधि
आराम और पुष्टिकारक भोजन है। न वह बसंत-मालती का सेवन कर सकता था और न आराम से
बैठकर बलबर्धक भोजन कर सकता था। कमजोरी बढ़ती ही गई।
पन्ना
को अवसर मिलता, तो वह आकर उसे तसल्ली
देती: लेकिन उसके लड़के अब रग्घू से बात भी न करते थे। दवा-दारु तो क्या करतें, उसका और मजाक उड़ाते। भैया समझते थे कि
हम लोगों से अलग होकर सोने और ईट रख लेंगे। भाभी भी समझती थीं, सोने से लद जाऊँगी। अब देखें कौन पूछता
है? सिसक-सिसककर न मरें
तो कह देना। बहुत ‘हाय! हाय!’ भी अच्छी नहीं होती। आदमी उतना काम करे, जितना हो सके। यह नहीं कि रुपये के लिए
जान दे दे।
पन्ना
कहती—रग्घू बेचारे का कौन
दोष है?
केदार
कहता—चल, मैं खूब समझता हूँ। भैया की जगह मैं
होता, तो डंडे से बात करता।
मजाक थी कि औरत यों जिद करती। यह सब भैया की चाल थी। सब सधी-बधी बात थी।
आखिर
एक दिन रग्घू का टिमटिमाता हुआ जीवन-दीपक बुझ गया। मौत ने सारी चिन्ताओं का अंत कर
दिया।
अंत
समय उसने केदार को बुलाया था: पर केदार को ऊख में पानी देना था। डरा, कहीं दवा के लिए न भेज दें। बहाना बना
दिया।
8
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मु
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लिया का जीवन अंधकारमय हो गया। जिस भूमि
पर उसने मनसूबों की दीवार खड़ी की थी, वह नीचे से खिसक गई
थी। जिस खूँटें के बल पर वह उछल रही थी, वह उखड़ गया था।
गॉँववालों ने कहना शुरु किया, ईश्वर ने कैसा तत्काल
दंड दिया। बेचारी मारे लाज के अपने दोनों बच्चों को लिये रोया करती। गॉँव में किसी
को मुँह दिखाने का साहस न होता। प्रत्येक प्राणी उससे यह कहता हुआ मालूम होता था—‘मारे घमण्ड के धरती पर पॉँव न रखती थी:
आखिर सजा मिल गई कि नहीं !’ अब इस घर में कैसे
निर्वाह होगा? वह किसके सहारे रहेगी? किसके बल पर खेती होगी? बेचारा रग्घू बीमार था। दुर्बल था, पर जब तक जीता रहा, अपना काम करता रहा। मारे कमजोरी के
कभी-कभी सिर पकड़कर बैठ जाता और जरा दम लेकर फिर हाथ चलाने लगता था। सारी खेती
तहस-नहस हो रही थी, उसे कौन संभालेगा? अनाज की डॉँठें खलिहान में पड़ी थीं, ऊख अलग सूख रही थी। वह अकेली क्या-क्या
करेगी? फिर सिंचाई अकेले
आदमी का तो काम नहीं। तीन-तीन मजदूरों को कहॉँ से लाए! गॉँव में मजदूर थे ही
कितने। आदमियों के लिए खींचा-तानी हो रही थी। क्या करें, क्या न करे।
इस
तरह तेरह दिन बीत गए। क्रिया-कर्म से छुट्टी मिली। दूसरे ही दिन सवेरे मुलिया ने
दोनों बालकों को गोद में उठाया और अनाज मॉँड़ने चली। खलिहान में पहुंचकर उसने एक
को तो पेड़ के नीचे घास के नर्म बिस्तर पर सुला दिया और दूसरे को वहीं बैठाकर अनाज
मॉँड़ने लगी। बैलों को हॉँकती थी और रोती थी। क्या इसीलिए भगवान् ने उसको जन्म
दिया था? देखते-देखते क्या वे
क्या हो गया? इन्हीं दिनों पिछले
साल भी अनाज मॉँड़ा गया था। वह रग्घू के लिए लोटे में शरबत और मटर की घुँघी लेकर
आई थी। आज कोई उसके आगे है, न पीछे: लेकिन किसी
की लौंडी तो नहीं हूँ! उसे अलग होने का अब भी पछतावा न था।
एकाएक
छोटे बच्चे का रोना सुनकर उसने उधर ताका, तो बड़ा लड़का उसे
चुमकारकर कह रहा था—बैया तुप रहो, तुप रहो। धीरे-धीरे उसके मुंह पर हाथ
फेरता था और चुप कराने के लिए विकल था। जब बच्चा किसी तरह न चुप न हुआ तो वह खुद
उसके पास लेट गया और उसे छाती से लगाकर प्यार करने लगा: मगर जब यह प्रयत्न भी सफल
न हुआ, तो वह रोने लगा।
उसी
समय पन्ना दौड़ी आयी और छोटे बालक को गोद में उठाकर प्यार करती हुई बोली—लड़कों को मुझे क्यों न दे आयी बहू? हाय! हाय! बेचारा धरती पर पड़ा लोट रहा
है। जब मैं मर जाऊँ तो जो चाहे करना, अभी तो जीती हूँ, अलग हो जाने से बच्चे तो नहीं अलग हो
गए।
मुलिया
ने कहा—तुम्हें भी तो छुट्टी
नहीं थी अम्मॉँ, क्या करती?
पन्ना—तो तुझे यहॉँ आने की ऐसी क्या जल्दी थी? डॉँठ मॉँड़ न जाती। तीन-तीन लड़के तो
हैं, और किसी दिन काम
आऍंगे? केदार तो कल ही
मॉँड़ने को कह रहा था: पर मैंने कहा, पहले ऊख में पानी दे
लो, फिर आज मॉड़ना, मँड़ाई तो दस दिन बाद भ हो सकती है, ऊख की सिंचाई न हुई तो सूख जाएगी। कल से
पानी चढ़ा हुआ है, परसों तक खेत पुर
जाएगा। तब मँड़ाई हो जाएगी। तुझे विश्वास न आएगा, जब
से भैया मरे हैं, केदार को बड़ी चिंता
हो गई है। दिन में सौ-सौ बार पूछता है, भाभी बहुत रोती तो
नहीं हैं? देख, लड़के भूखे तो नहीं हैं। कोई लड़का रोता
है, तो दौड़ा आता है, देख अम्मॉँ, क्या हुआ, बच्चा
क्यों रोता है? कल रोकर बोला—अम्मॉँ, मैं
जानता कि भैया इतनी जल्दी चले जाऍंगे, तो उनकी कुछ सेवा कर
लेता। कहॉँ जगाए-जगाए उठता था, अब देखती हो, पहर रात से उठकर काम में लग जाता है।
खुन्नू कल जरा-सा बोला, पहले हम अपनी ऊख में
पानी दे लेंगे, तब भैया की ऊख में
देंगे। इस पर केदार ने ऐसा डॉँटा कि खुन्नू के मुँह से फिर बात न निकली। बोला, कैसी तुम्हारी और कैसी हमारी ऊख? भैया ने जिला न लिया होता,
तो
आज या तो मर गए होते या कहीं भीख मॉँगते होते। आज तुम बड़े ऊखवाले बने हो! यह
उन्हीं का पुन-परताप है कि आज भले आदमी बने बैठे हो। परसों रोटी खाने को बुलाने गई, तो मँड़ैया में बैठा
रो रहा था। पूछा, क्यों रोता है? तो बोला, अम्मॉँ, भैया इसी ‘अलग्योझ’
के दुख से मर गए, नहीं अभी उनकी उमिर
ही क्या थी! यह उस वक्त न सूझा, नहीं उनसे क्यों
बिगाड़ करते?
यह
कहकर पन्ना ने मुलिया की ओर संकेतपूर्ण दृष्टि से देखकर कहा—तुम्हें वह अलग न रहने देगा बहू, कहता है, भैया
हमारे लिए मर गए तो हम भी उनके बाल-बच्चों के लिए मर जाऍंगे।
मुलिया
की आंखों से ऑंसू जारी थे। पन्ना की बातों में आज सच्ची वेदना, सच्ची सान्त्वना, सच्ची चिन्ता भरी हुई थी। मुलिया का मन
कभी उसकी ओर इतना आकर्षित न हुआ था। जिनसे उसे व्यंग्य और प्रतिकार का भय था, वे इतने दयालु, इतने शुभेच्छु हो गए थे।
आज
पहली बार उसे अपनी स्वार्थपरता पर लज्जा आई। पहली बार आत्मा ने अलग्योझे पर
धिक्कारा।
9
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इ
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स घटना को हुए पॉँच साल गुजर गए। पन्ना
आज बूढ़ी हो गई है। केदार घर का मालिक है। मुलिया घर की मालकिन है। खुन्नू और लछमन
के विवाह हो चुके हैं: मगर केदार अभी तक क्वॉँरा है। कहता हैं— मैं विवाह न करुँगा। कई जगहों से बातचीत
हुई, कई सगाइयॉँ आयीं: पर
उसे हामी न भरी। पन्ना ने कम्पे लगाए, जाल फैलाए, पर व न फँसा। कहता—औरतों से कौन सुख? मेहरिया घर में आयी और आदमी का मिजाज
बदला। फिर जो कुछ है, वह मेहरिया है।
मॉँ-बाप, भाई-बन्धु सब पराए
हैं। जब भैया जैसे आदमी का मिजाज बदल गया, तो फिर दूसरों की
क्या गिनती? दो लड़के भगवान् के
दिये हैं और क्या चाहिए। बिना ब्याह किए दो बेटे मिल गए, इससे बढ़कर और क्या होगा? जिसे अपना समझो, व अपना है: जिसे गैर समझो, वह गैर है।
एक
दिन पन्ना ने कहा—तेरा वंश कैसे चलेगा?
केदार—मेरा वंश तो चल रहा है। दोनों लड़कों को
अपना ही समझता हूं।
पन्ना—समझने ही पर है, तो तू मुलिया को भी अपनी मेहरिया समझता
होगा?
केदार
ने झेंपते हुए कहा—तुम तो गाली देती हो
अम्मॉँ!
पन्ना—गाली कैसी, तेरी भाभी ही तो है!
केदार—मेरे जेसे लट्ठ-गँवार को वह क्यों पूछने
लगी!
पन्ना—तू करने को कह, तो मैं उससे पूछूँ?
केदार—नहीं मेरी अम्मॉँ, कहीं रोने-गाने न लगे।
पन्ना—तेरा
मन हो, तो मैं बातों-बातों
में उसके मन की थाह लूँ?
केदार—मैं नहीं जानता, जो चाहे कर।
पन्ना
केदार के मन की बात समझ गई। लड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है: पर संकोच और भय के
मारे कुछ नहीं कहता।
उसी
दिन उसने मुलिया से कहा—क्या करुँ बहू, मन की लालसा मन में ही रह जाती है।
केदार का घर भी बस जाता, तो मैं निश्चिन्त हो
जाती।
मुलिया—वह तो करने को ही नहीं कहते।
पन्ना—कहता है, ऐसी
औरत मिले, जो घर में मेल से रहे, तो कर लूँ।
मुलिया—ऐसी औरत कहॉँ मिलेगी? कहीं ढूँढ़ो।
पन्ना—मैंने तो ढूँढ़ लिया है।
मुलिया—सच,
किस
गॉँव की है?
पन्ना—अभी न बताऊँगी, मुदा यह जानती हूँ कि उससे केदार की सगाई हो जाए, तो घर बन जाए और केदार की जिन्दगी भी
सुफल हो जाए। न जाने लड़की मानेगी कि नहीं।
मुलिया—मानेगी क्यों नहीं अम्मॉँ, ऐसा सुन्दर कमाऊ, सुशील वर और कहॉँ मिला जाता है? उस जनम का कोई साधु-महात्मा है, नहीं तो लड़ाई-झगड़े के डर से कौन बिन
ब्याहा रहता है। कहॉँ रहती है, मैं जाकर उसे मना
लाऊँगी।
पन्ना—तू चाहे, तो
उसे मना ले। तेरे ही ऊपर है।
मुलिया—मैं आज ही चली जाऊँगी, अम्मा, उसके
पैरों पड़कर मना लाऊँगी।
पन्ना—बता दूँ, वह
तू ही है!
मुलिया
लजाकर बोली—तुम तो अम्मॉँजी, गाली देती हो।
पन्ना—गाली कैसी, देवर ही तो है!
मुलिया—मुझ जैसी बुढ़िया को वह क्यों पूछेंगे?
पन्ना—वह तुझी पर दॉँत लगाए बैठा है। तेरे
सिवा कोई और उसे भाती ही नहीं। डर के मारे कहता नहीं: पर उसके मन की बात मैं जानती
हूँ।
वैधव्य
के शौक से मुरझाया हुआ मुलिया का पीत वदन कमल की भॉँति अरुण हो उठा। दस वर्षो में
जो कुछ खोया था, वह इसी एक क्षण में
मानों ब्याज के साथ मिल गया। वही लवण्य, वही विकास, वहीं आकर्षण, वहीं लोच।
ईदगाह
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र
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मजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी
है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव
है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब
रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब
लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है।
गॉंव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में
बटन नहीं है, पड़ोस के घर में
सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर
भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर
हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों
से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना
असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से
की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते
थे, आज वह आ गई। अब जल्दी
पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी चिंताओं से क्या प्रयोजन!
सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी
बला से, ये तो सेवेयां
खाऍंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे
हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी ऑंखें बदल लें,
तो
यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर काधन भरा हुआ है।
बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद
गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहनसिन के
पास एक, दो, तीन,
आठ, नौ,
पंद्रह
पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद
और जाने क्या-क्या।
और
सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया
और मॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता क्या बीमारी है। कहती
तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती
थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी
बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपये
कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे। अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घर से उसके
लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न
है। आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की
आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हे। हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके
अब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी,
तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा,
मोहसिन, नूरे और सम्मी कहॉँ
से उतने पैसे निकालेंगे।
अभागिन
अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके
घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद
आती ओर चली जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस
निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम
नहीं, लेकिन हामिद! उसे
किसी के मरने-जीने के क्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर
आये, हामिद की आनंद-भरी
चितबन उसका विध्वसं कर देगी।
हामिद
भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।
अमीना
का दिल कचोट रहा है। गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप
अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो
क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्ही-सी
जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़
जाऍंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँ सेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री
जमा करके चटपट बना लेती। यहॉँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे। मॉँगे का ही तो
भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पेसे मिले थे। उस उठन्नी को
ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो
क्या करती? हामिद के लिए कुछ
नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो
चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटुवें में। यही तो बिसात
है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा पर
लगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी। सभी को सेवेयॉँ चाहिए
और थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं। जिन्दगी खैरियत
से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी
के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट
जाऍंगे।
गॉँव
से मेला चला। ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल
जाते। फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते। यह लोग क्यों
इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरो में तो
जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया।
सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम
और लीचियॉँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता हे।
माली अंदर से गाली देता हुआ निंलता है। लड़के वहाँ से एक फलॉँग पर हैं। खूब हँस
रहे हैं। माली को केसा उल्लू बनाया है।
बड़ी-बड़ी
इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़े कालेज में
कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं
जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी
मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जाते
हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन
बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी
के। रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने
वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती हैं।
और बड़े-बड़े तमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं
जाने देते। और वहॉँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले। और मेमें भी खेलती
हैं, सच! हमारी अम्मॉँ को
यह दे दो, क्या नाम है, बैट,
तो
उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढ़क जाऍं।
महमूद
ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो
हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम।
मोहसिन
बोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं। जरा-सा बैट
पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपने
लगेंगे! सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है।
किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ
जाए।
महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं।
मोहसिन—हॉँ,
उछल-कूद
तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी
गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी,
अम्मॉँ
इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें न पा सका, सच।
आगे
चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयॉँ कौन खाता? देखो न, एक-एक
दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर
खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और
जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और
सचमुच के रूपये देता है, बिल्कुल ऐसे ही
रूपये।
हामिद
को यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को
कहॉँ से मिल जाऍंगी?
मोहसिन
ने कहा—जिन्नात को रूपये की
क्या कमी? जिस खजाने में चाहें
चले जाऍं। लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक
उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात
दे दिए। अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में
कलकत्ता पहुँच जाऍं।
हामिद
ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत
बड़े-बड़े होते हैं?
मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी!
जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर
चाहे तो एक लोटे में घुस जाए।
हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को
खुश कर लूँ।
मोहसिन—अब यह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से
जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता
देगें। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास
गए। चौधरी ने तुरन्त बता दिया, मवेशीखाने में है और
वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।
अब
उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान
है।
आगे
चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को
बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो
जाऍं। मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा
देते हें? तभी तुम बहुत जानते
हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं।
शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में
जाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास इतने
रूपये आते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें। अल्ला
कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ
से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह
देता है। फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक
दिन में लाखों मार लाऍं। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें
अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।
हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?
मोहसिन
उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन
पकड़ेगा! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम का माल
हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग
गई। सारी लेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए,
अल्ला
कसम, पेड़ के नीचे! फिरन
जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए।
हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?
‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है।
सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?
अब
बस्ती घनी होने लगी। ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी। एक से एक भड़कीले
वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-तॉँगे पर सवार,
कोई
मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह
छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में
मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर
ताकते, ताकते ही रह जाते और
पीछे से आर्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
सहसा
ईदगाह नजर आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया हे। नाचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम ढिछा हुआ
है। और रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जाने कहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहॉँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर
पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हे। यहॉँ कोई धन और पद नहीं
देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हें। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली
पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी
सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती हे, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ
प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त
आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं।
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न
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माज खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल
रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस
विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला
हें एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं। एक पेसा देकर
बैठ जाओं और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन
घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते हें। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं।
अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।
सब
चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। अधर दूकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह
के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्ती और धोबिन और साधु। वह! कत्ते
सुन्दर खिलोने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को
भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं
मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है।
बस, मशक से पानी अड़ेला
ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम हे। कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए।
मालूम होता है, अभी किसी अदालत से
जिरह या बहस किए चले आ रहे है। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल
तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह
केसे ले? खिलौना कहीं हाथ से
छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर
वह क्या करेगा, किस काम के!
मोहसिन
कहता है—मेरा भिश्ती रोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरे
महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर
आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर
कर देगा।
नूरे—ओर मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।
सम्मी—ओर मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।
हामिद
खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं, लेकिन ललचाई हुई ऑंखों से खिलौनों को
देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ
अनायास ही लपकते हें, लेकिन लड़के इतने
त्यागी नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक
है। हामिद ललचता रह जाता है।
खिलौने
के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी
ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है।
अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबक ओर देखता है।
मोहसिन
कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!
हामिद
को सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद
हें मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह
उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद
हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह
में रख लेता है। महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद
खिसिया जाता है।
मोहसिन—अच्छा, अबकी
जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा।
हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं है?
सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं। तीन पैसे में
क्या-क्या लोगें?
महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन
बदमाश है।
हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी
कितनी बुराइयॉँ लिखी हैं।
मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा
लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?
महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च
हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर
खाएगा।
मिठाइयों
के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली
गहनों की। लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पररूक जात हे। कई
चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा
नहीं है। तबे से रोटियॉँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले
जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँ कभी न जलेंगी। घर
में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ
में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई ऑंख
उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे। चिमटा कितने
काम की चीज है। रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक
लो। कोई आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्मॉँ बेचारी को
कहॉँ फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज हाथ जला लेती हैं।
हामिद
के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कतने लालची हैं। इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करों। अब
अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाऍं
मिठाइयॉँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से
पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हें। मेरी जबान
क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते
ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के
लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं
देगा? बड़ों का दुआऍं सीधे
अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती
हैं। में भी इनसे मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते। आखिर
अब्बाजान कभीं न कभी आऍंगे। अम्मा भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा
हूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है। यह नहीं कि एक पैसे की
रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर
खाने लगे। सबके सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हंसें! मेरी बला से! उसने
दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?
दुकानदार
ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं
है जी!
‘बिकाऊ है कि नहीं?’
‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?’
तो
बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छ: पैसे लगेंगे।‘
हामिद
का दिल बैठ गया।
‘ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।‘
हामिद
ने कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?
यह
कहता हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने
घुड़कियॉँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ
संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या
आलोचनाऍं करते हैं!
मोहसिन
ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया
पगले, इसे क्या करेगा?
हामिद
ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन
पर गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की।
महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?
हामिद—खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे
मजीरे काकाम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ,
तो
तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर
सकतें मेरा बहादुर शेर है चिमटा।
सम्मी
ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।
हामिद
ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेट फाड़
डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली
लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी।
जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी
में, तूफान में बराबर डटा
खड़ा रहेगा।
चिमटे
ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास
धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल
आए हें, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी
हो रही हे। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल
सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
अब
बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रर्थ हो
रहा है। सम्मी तो विधर्मी हा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के
आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास
न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी
ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को
फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर
आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर
भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट
जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर
सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
मोहसिन
ने एड़ी—चोटी का जारे लगाकर
कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?
हामिद
ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट
बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी
लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिन
परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक
पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो
अदालम में बॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेगे।
हामिद
इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?
नूरे
ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला।
हामिद
ने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर
रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें!
अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो
जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगें क्या बेचारे!
मोहसिन
को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का
मुँह रोज आग में जलेगा।
उसने
समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत
जवाब दिया—आग में बहादुर ही
कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लैडियों की तरह घर
में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द
ही कर सकता है।
महमूद
ने एक जोर लगाया—वकील साहब कुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबरचीखाने में जमीन
पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
इस
तर्क ने सम्मी औरनूरे को भी सजी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही हे पट्ठे ने!
चिमटा बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
हामिद
को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू
की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा।
वकील साहब कुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन
पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में
डाल देगा।
बात
कुछ बनी नही। खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट
में डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई
धेलचा कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली
चीज हे। उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती
हे। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द हे। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
विजेता
को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है,
वह
हामिद को भी मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे
खर्च किए, पर कोई काम की चीज न
ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना
रहेगा बरसों?
संधि
की शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमार भिश्ती लेकर
देखो।
महमूद
और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
हामिद को इन शर्तो को
मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के
हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं।
हामिद
ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहा
था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब
बोले।
लेकिन
मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया
है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ
तो न देगा?
महमूद—दुआ को लिय फिरते हो। उल्टे मार न पड़े।
अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?
हामिद
को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन
पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल
जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रूस्तमें—हिन्द हे ओर सभी
खिलौनों का बादशाह।
रास्ते
में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दियें। महमून ने केवल हामिद को
साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद थां।
3
|
ग्या
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रह बजे गॉँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ
गए। मोहसिन की छोटी बहन दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा
उछली, तो मियॉं भिश्ती
नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों खुब रोए। उसकी
अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉँटे और लगाए।
मियॉँ
नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या
ताक पर हो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में
खूँटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिदाया
गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना
शुरू किया। आदालतों में खर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हें। क्या यहॉँ
मामूली पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरे हवा करने लगें
मालूम नहीं, पंखे की हवा से या
पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला
माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर
डाल दी गई।
अब
रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण
व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें
वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के
फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी
उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते
लहो’ पुकारते चलते हें।
मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग
जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये
जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है।
महमूद
को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी
टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग
जावब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग
भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टॉँग से तो न
चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह
सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी
बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर
चाहों, कर सकते हो। कभी-कभी
तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।
अब
मियॉँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार
करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
‘यह चिमटा कहॉं था?’
‘मैंने मोल लिया है।‘
‘कै पैसे में?
‘तीन पैसे दिये।‘
अमीना
ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! ‘सारे
मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा
उठा लाया?’
हामिद
ने अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ
तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।
बुढ़िया का क्रोध
तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक
शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था,
खूब
ठोस, रस और स्वाद से भरा
हुआ। बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितना
विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद
बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।
और
अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद कें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने
बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी।
दामन फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती
थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!
माँ
|
आ
|
ज बन्दी छूटकर घर
आ रहा है। करुणा ने एक दिन पहले ही घर लीप-पोत रखा था। इन तीन वर्षो में उसने कठिन
तपस्या करके जो दस-पॉँच रूपये जमा कर रखे थे, वह सब पति के सत्कार और स्वागत की तैयारियों में खर्च कर दिए। पति के लिए
धोतियों का नया जोड़ा लाई थी, नए कुरते बनवाए थे, बच्चे के लिए नए कोट और टोपी की आयोजना की थी। बार-बार बच्चे को गले लगाती ओर
प्रसन्न होती। अगर इस बच्चे ने सूर्य की भॉँति उदय होकर उसके अंधेरे जीवन को
प्रदीप्त न कर दिया होता, तो कदाचित् ठोकरों ने उसके जीवन का अन्त कर दिया होता। पति
के कारावास-दण्ड के तीन ही महीने बाद इस बालक का जन्म हुआ। उसी का मुँह देख-देखकर
करूणा ने यह तीन साल काट दिए थे। वह सोचती—जब मैं बालक को उनके
सामने ले जाऊँगी, तो वह कितने प्रसन्न
होंगे! उसे देखकर पहले तो चकित हो जाऍंगे, फिर गोद में उठा
लेंगे और कहेंगे—करूणा, तुमने यह रत्न देकर मुझे निहाल कर दिया।
कैद के सारे कष्ट बालक की तोतली बातों में भूल जाऍंगे, उनकी एक सरल, पवित्र, मोहक
दृष्टि दृदय की सारी व्यवस्थाओं को धो डालेगी। इस कल्पना का आन्नद लेकर वह फूली न
समाती थी।
वह
सोच रही थी—आदित्य के साथ बहुत—से आदमी होंगे। जिस समय वह द्वार पर
पहुँचेगे, जय—जयकार’
की ध्वनि से आकाश गूँज उठेगा। वह कितना स्वर्गीय दृश्य होगा! उन आदमियों के बैठने
के लिए करूणा ने एक फटा-सा टाट बिछा दिया था,
कुछ
पान बना दिए थे ओर बार-बार आशामय नेत्रों से द्वार की ओर ताकती थी। पति की वह
सुदृढ़ उदार तेजपूर्ण मुद्रा बार-बार ऑंखों में फिर जाती थी। उनकी वे बातें
बार-बार याद आती थीं, जो चलते समय उनके मुख
से निकलती थी, उनका वह धैर्य, वह आत्मबल, जो पुलिस के प्रहारों के सामने भी अटल
रहा था, वह मुस्कराहट जो उस
समय भी उनके अधरों पर खेल रही थी; वह आत्मभिमान, जो उस समय भी उनके मुख से टपक रहा था, क्या करूणा के हृदय से कभी विस्मृत हो
सकता था! उसका स्मरण आते ही करुणा के निस्तेज मुख पर आत्मगौरव की लालिमा छा गई।
यही वह अवलम्ब था, जिसने इन तीन वर्षो
की घोर यातनाओं में भी उसके हृदय को आश्वासन दिया था। कितनी ही राते फाकों से
गुजरीं, बहुधा घर में दीपक
जलने की नौबत भी न आती थी, पर दीनता के आँसू कभी
उसकी ऑंखों से न गिरे। आज उन सारी विपत्तियों का अन्त हो जाएगा। पति के प्रगाढ़
आलिंगन में वह सब कुछ हँसकर झेल लेगी। वह अनंत निधि पाकर फिर उसे कोई अभिलाषा न
रहेगी।
गगन-पथ
का चिरगामी लपका हुआ विश्राम की ओर चला जाता था, जहॉँ
संध्या ने सुनहरा फर्श सजाया था और उज्जवल पुष्पों की सेज बिछा रखी थी। उसी समय
करूणा को एक आदमी लाठी टेकता आता दिखाई दिया,
मानो
किसी जीर्ण मनुष्य की वेदना-ध्वनि हो। पग-पग पर रूककर खॉँसने लगता थी। उसका सिर
झुका हुआ था, करणा उसका चेहरा न
देख सकती थी, लेकिन चाल-ढाल से कोई
बूढ़ा आदमी मालूम होता था; पर एक क्षण में जब वह
समीप आ गया, तो करूणा पहचान गई।
वह उसका प्यारा पति ही था, किन्तु शोक! उसकी
सूरत कितनी बदल गई थी। वह जवानी, वह तेज, वह चपलता, वह सुगठन, सब
प्रस्थान कर चुका था। केवल हड्डियों का एक ढॉँचा रह गया था। न कोई संगी, न साथी, न
यार, न दोस्त। करूणा उसे
पहचानते ही बाहर निकल आयी, पर आलिंगन की कामना
हृदय में दबाकर रह गई। सारे मनसूबे धूल में मिल गए। सारा मनोल्लास ऑंसुओं के
प्रवाह में बह गया, विलीन हो गया।
आदित्य
ने घर में कदम रखते ही मुस्कराकर करूणा को देखा। पर उस मुस्कान में वेदना का एक
संसार भरा हुआ थां करूणा ऐसी शिथिल हो गई, मानो हृदय का स्पंदन रूक गया हो। वह फटी
हुई आँखों से स्वामी की ओर टकटकी बॉँधे खड़ी थी, मानो
उसे अपनी ऑखों पर अब भी विश्वास न आता हो। स्वागत या दु:ख का एक शब्द भी उसके मुँह
से न निकला। बालक भी गोद में बैठा हुआ सहमी ऑखें से इस कंकाल को देख रहा था और
माता की गोद में चिपटा जाता था।
आखिर
उसने कातर स्वर में कहा—यह तुम्हारी क्या दशा
है? बिल्कुल पहचाने नहीं
जाते!
आदित्य
ने उसकी चिन्ता को शांत करने के लिए मुस्कराने की चेष्टा करके कहा—कुछ नहीं, जरा
दुबला हो गया हूँ। तुम्हारे हाथों का भोजन पाकर फिर स्वस्थ हो जाऊँगा।
करूणा—छी! सूखकर काँटा हो गए। क्या वहॉँ भरपेट
भोजन नहीं मिलात? तुम कहते थे, राजनैतिक आदमियों के साथ बड़ा अच्छा
व्यवहार किया जाता है और वह तुम्हारे साथी क्या हो गए जो तुम्हें आठों पहर घेरे
रहते थे और तुम्हारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार रहते थे?
आदित्य की त्योरियों
पर बल पड़ गए। बोले—यह बड़ा ही कटु अनुभव
है करूणा! मुझे न मालूम था कि मेरे कैद होते ही लोग मेरी ओर से यों ऑंखें फेर
लेंगे, कोई बात भी न पूछेगा।
राष्ट्र के नाम पर मिटनेवालों का यही पुरस्कार है,
यह मुझे न मालूम था। जनता अपने सेवकों को बहुत जल्द भूल जाती है, यह तो में जानता था, लेकिन अपने सहयोगी ओर सहायक इतने बेवफा
होते हैं, इसका मुझे यह पहला ही
अनुभव हुआ। लेकिन मुझे किसी से शिकायत नहीं। सेवा स्वयं अपना पुरस्कार हैं। मेरी
भूल थी कि मैं इसके लिए यश और नाम चाहता था।
करूणा—तो क्या वहाँ भोजन भी न मिलता था?
आदित्य—यह न पूछो करूणा, बड़ी करूण कथा है। बस, यही गनीमत समझो कि जीता लौट आया।
तुम्हारे दर्शन बदे थे, नहीं कष्ट तो ऐसे-ऐसे
उठाए कि अब तक मुझे प्रस्थान कर जाना चाहिए था। मैं जरा लेटँगा। खड़ा नहीं रहा
जाता। दिन-भर में इतनी दूर आया हूँ।
करूणा—चलकर कुछ खा लो, तो आराम से लेटो। (बालक को गोद में
उठाकर) बाबूजी हैं बेटा, तुम्हारे बाबूजी।
इनकी गोद में जाओ, तुम्हे प्यार करेंगे।
आदित्य ने ऑंसू-भरी
ऑंखों से बालक को देखा और उनका एक-एक रोम उनका तिरस्कार करने लगा। अपनी जीर्ण दशा
पर उन्हें कभी इतना दु:ख न हुआ था। ईश्वर की असीम दया से यदि उनकी दशा संभल जाती, तो वह फिर कभी राष्ट्रीय आन्दोलन के
समीप न जाते। इस फूल-से बच्चे को यों संसार में लाकर दरिद्रता की आग में झोंकने का
उन्हें क्या अधिकरा था? वह अब लक्ष्मी की
उपासना करेंगे और अपना क्षुद्र जीवन बच्चे के लालन-पालन के लिए अपिर्त कर देंगे।
उन्हें इस समय ऐसा ज्ञात हुआ कि बालक उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है, मानो कह रहा है—‘मेरे साथ आपने कौन-सा कर्त्तव्य-पालन
किया?’ उनकी सारी कामना, सारा प्यार बालक को हृदय से लगा देने के
लिए अधीर हो उठा, पर हाथ फैल न सके।
हाथों में शक्ति ही न थी।
करूणा बालक को लिये
हुए उठी और थाली में कुछ भोजन निकलकर लाई। आदित्य ने क्षुधापूर्ण, नेत्रों से थाली की ओर देखा, मानो आज बहुत दिनों के बाद कोई खाने की
चीज सामने आई हैं। जानता था कि कई दिनों के उपवास के बाद और आरोग्य की इस गई-गुजरी
दशा में उसे जबान को काबू में रखना चाहिए पर सब्र न कर सका, थाली पर टूट पड़ा और देखते-देखते थाली
साफ कर दी। करूणा सशंक हो गई। उसने दोबारा किसी चीज के लिए न पूछा। थाली उठाकर चली
गई, पर उसका दिल कह रहा
था-इतना तो कभी न खाते थे।
करूणा बच्चे को कुछ
खिला रही थी, कि एकाएक कानों में
आवाज आई—करूणा!
करूणा ने आकर पूछा—क्या तुमने मुझे पुकारा है?
आदित्य
का चेहरा पीला पड़ गया था और सॉंस जोर-जोर से चल रही थी। हाथों के सहारे वही टाट
पर लेट गए थे। करूणा उनकी यह हालत देखकर घबर गई। बोली—जाकर किसी वैद्य को बुला लाऊँ?
आदित्य
ने हाथ के इशारे से उसे मना करके कहा—व्यर्थ है करूणा! अब
तुमसे छिपाना व्यर्थ है, मुझे तपेदिक हो गया
हे। कई बार मरते-मरते बच गया हूँ। तुम लोगों के दर्शन बदे थे, इसलिए प्राण न निकलते थे। देखों प्रिये, रोओ मत।
करूणा
ने सिसकियों को दबाते हुए कहा—मैं वैद्य को लेकर
अभी आती हूँ।
आदित्य
ने फिर सिर हिलाया—नहीं करूणा, केवल मेरे पास बैठी रहो। अब किसी से कोई
आशा नहीं है। डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। मुझे तो यह आश्चर्य है कि यहॉँ पहुँच
कैसे गया। न जाने कौन दैवी शक्ति मुझे वहॉँ से खींच लाई। कदाचित् यह इस बुझते हुए
दीपक की अन्तिम झलक थी। आह! मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। इसका मुझे हमेशा
दु:ख रहेगा! मैं तुम्हें कोई आराम न दे सका। तुम्हारे लिए कुछ न कर सका। केवल
सोहाग का दाग लगाकर और एक बालक के पालन का भार छोड़कर चला जा रहा हूं। आह!
करूणा
ने हृदय को दृढ़ करके कहा—तुम्हें कहीं दर्द तो
नहीं है? आग बना लाऊँ? कुछ बताते क्यों नहीं?
आदित्य
ने करवट बदलकर कहा—कुछ करने की जरूरत
नहीं प्रिये! कहीं दर्द नहीं। बस, ऐसा मालूम हो रहा हे
कि दिल बैठा जाता है, जैसे पानी में डूबा
जाता हूँ। जीवन की लीला समाप्त हो रही हे। दीपक को बुझते हुए देख रहा हूँ। कह नहीं
सकता, कब आवाज बन्द हो जाए।
जो कुछ कहना है, वह कह डालना चाहता
हूँ, क्यों वह लालसा ले
जाऊँ। मेरे एक प्रश्न का जवाब दोगी, पूछूँ?
करूणा
के मन की सारी दुर्बलता, सारा शोक, सारी वेदना मानो लुप्त हो गई और उनकी
जगह उस आत्मबल काउदय हुआ, जो मृत्यु पर हँसता
है और विपत्ति के साँपों से खेलता है। रत्नजटित मखमली म्यान में जैसे तेज तलवार
छिपी रहती है, जल के कोमल प्रवाह
में जैसे असीम शक्ति छिपी रहती है, वैसे ही रमणी का कोमल
हृदय साहस और धैर्य को अपनी गोद में छिपाए रहता है। क्रोध जैसे तलवार को बाहर खींच
लेता है, विज्ञान जैसे
जल-शक्ति का उदघाटन कर लेता है, वैसे ही प्रेम रमणी
के साहस और धैर्य को प्रदीप्त कर देता है।
करूणा
ने पति के सिर पर हाथ रखते हुए कहा—पूछते क्यों नहीं
प्यारे!
आदित्य
ने करूणा के हाथों के कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए कहा—तुम्हारे विचार में मेरा जीवन कैसा था? बधाई के योग्य? देखो, तुमने
मुझसे कभी पर्दा नहीं रखा। इस समय भी स्पष्ट कहना। तुम्हारे विचार में मुझे अपने
जीवन पर हँसना चाहिए या रोना चाहिऍं?
करूणा
ने उल्लास के साथ कहा—यह प्रश्न क्यों करते
हो प्रियतम? क्या मैंने तुम्हारी
उपेक्षा कभी की हैं? तुम्हारा जीवन
देवताओं का—सा जीवन था, नि:स्वार्थ, निर्लिप्त और आदर्श! विघ्न-बाधाओं से
तंग आकर मैंने तुम्हें कितनी ही बार संसार की ओर खींचने की चेष्टा की है; पर उस समय भी मैं मन में जानती थी कि
मैं तुम्हें ऊँचे आसन से गिरा रही हूं। अगर तुम माया-मोह में फँसे होते, तो कदाचित् मेरे मन को अधिक संतोष होता; लेकिन मेरी आत्मा को वह गर्व और उल्लास
न होता, जो इस समय हो रहा है।
मैं अगर किसी को बड़े-से-बड़ा आर्शीवाद दे सकती हूँ, तो
वह यही होगा कि उसका जीवन तुम्हारे जैसा हो।
यह
कहते-कहते करूणा का आभाहीन मुखमंडल जयोतिर्मय हो गया, मानो उसकी आत्मा दिव्य हो गई हो। आदित्य
ने सगर्व नेत्रों से करूणा को देखकर कहा
बस, अब मुझे संतोष हो गया, करूणा, इस
बच्चे की ओर से मुझे कोई शंका नहीं है, मैं उसे इससे अधिक
कुशल हाथों में नहीं छोड़ सकता। मुझे विश्वास है कि जीवन-भर यह ऊँचा और पवित्र
आदर्श सदैव तुम्हारे सामने रहेगा। अब मैं मरने को तैयार हूँ।
2
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सा
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त वर्ष बीत गए।
बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख
कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी। भय तो उसे छू भी नहीं
गया था। करूणा का संतप्त हृदय उसे देखकर शीतल हो जाता। संसार करूणा को अभागिनी और
दीन समझे। वह कभी भाग्य का रोना नहीं रोती। उसने उन आभूषणों को बेच डाला, जो पति के जीवन में उसे प्राणों से
प्रिय थे, और उस धन से कुछ
गायें और भैंसे मोल ले लीं। वह कृषक की बेटी थी, और
गो-पालन उसके लिए कोई नया व्यवसाय न था। इसी को उसने अपनी जीविका का साधन बनाया।
विशुद्ध दूध कहॉँ मयस्सर होता है? सब दूध हाथों-हाथ बिक
जाता। करूणा को पहर रात से पहर रात तक काम में लगा रहना पड़ता, पर वह प्रसन्न थी। उसके मुख पर निराशा
या दीनता की छाया नहीं, संकल्प और साहस का
तेज है। उसके एक-एक अंग से आत्मगौरव की ज्योति-सी निकल रही है; ऑंखों में एक दिव्य प्रकाश है, गंभीर, अथाह
और असीम। सारी वेदनाऍं—वैधव्य का शोक और
विधि का निर्मम प्रहार—सब उस प्रकाश की गहराई
में विलीन हो गया है।
प्रकाश पर वह जान
देती है। उसका आनंद, उसकी अभिलाषा, उसका संसार उसका स्वर्ग सब प्रकाश पर
न्यौछावर है; पर यह मजाल नहीं कि
प्रकाश कोई शरारत करे और करूणा ऑखें बंद कर ले। नहीं, वह उसके चरित्र की बड़ी कठोरता से
देख-भाल करती है। वह प्रकाश की मॉँ नहीं, मॉँ-बाप दोनों हैं।
उसके पुत्र-स्नेह में माता की ममता के साथ पिता की कठोरता भी मिली हुई है। पति के
अन्तिम शब्द अभी तक उसके कानों में गूँज रहे हैं। वह आत्मोल्लास, जो उनके चेहरे पर झलकने लगा था, वह गर्वमय लाली, जो उनकी ऑंखो में छा गई थी, अभी तक उसकी ऑखों में फिर रही है।
निरंतर पति-चिन्तन ने आदित्य को उसकी ऑंखों में प्रत्यक्ष कर दिया है। वह सदैव
उनकी उपस्थिति का अनुभव किया करती है। उसे ऐसा जान पड़ता है कि आदित्य की आत्मा
सदैव उसकी रक्षा करती रहती है। उसकी यही हार्दिक अभिलाषा है कि प्रकाश जवान होकर
पिता का पथगामी हो।
संध्या हो गई थी। एक
भिखारिन द्वार पर आकर भीख मॉँगने लगी। करूणा उस समय गउओं को पानी दे रही थी।
प्रकाश बाहर खेल रहा था। बालक ही तो ठहरा! शरारत सूझी। घर में गया और कटोरे में
थोड़ा-सा भूसा लेकर बाहर निकला। भिखारिन ने अबकी झेली फैला दी। प्रकाश ने भूसा
उसकी झोली में डाल दिया और जोर-जोर से तालियॉँ बजाता हुआ भागा।
भिखारिन ने अग्निमय
नेत्रों से देखकर कहा—वाह रे लाड़ले! मुझसे
हँसी करने चला है! यही मॉँ-बाप ने सिखाया है! तब तो खूब कुल का नाम जगाओगे!
करूणा उसकी बोली
सुनकर बाहर निकल आयी और पूछा—क्या है माता? किसे कह रही हो?
भिखारिन ने प्रकाश की
तरफ इशारा करके कहा—वह तुम्हारा लड़का है
न। देखो, कटोरे में भूसा भरकर
मेरी झोली में डाल गया है। चुटकी-भर आटा था, वह भी मिट्टी में
मिल गया। कोई इस तरह दुखियों को सताता है? सबके दिन एक-से नहीं
रहते! आदमी को घंमड न करना चाहिए।
करूणा ने कठोर स्वर
में पुकारा—प्रकाश?
प्रकाश लज्जित न हुआ।
अभिमान से सिर उठाए हुए आया और बोला—वह हमारे घर भीख
क्यों मॉँगने आयी है? कुछ काम क्यों नहीं
करती?
करुणा ने उसे समझाने
की चेष्टा करके कहा—शर्म नहीं आती, उल्टे और ऑंख दिखाते हो।
प्रकाश—शर्म क्यों आए? यह क्यों रोज भीख मॉँगने आती है? हमारे यहॉँ क्या कोई चीज मुफ्त आती है?
करूणा—तुम्हें कुछ न देना था तो सीधे से कह
देते; जाओ। तुमने यह शरारत क्यों
की?
प्रकाश—उनकी आदत कैसे छूटती?
करूणा
ने बिगड़कर कहा—तुम अब पिटोंगे मेरे
हाथों।
प्रकाश—पिटूँगा क्यों? आप जबरदस्ती पीटेंगी? दूसरे मुल्कों में अगर कोई भीख मॉँगे, तो कैद कर लिया जाए। यह नहीं कि उल्टे
भिखमंगो को और शह दी जाए।
करूणा—जो अपंग है, वह कैसे काम करे?
प्रकाश—तो जाकर डूब मरे, जिन्दा क्यों रहती है?
करूणा
निरूत्तर हो गई। बुढ़िया को तो उसने आटा-दाल देकर विदा किया, किन्तु प्रकाश का कुतर्क उसके हृदय में
फोड़े के समान टीसता रहा। उसने यह धृष्टता,
यह
अविनय कहॉँ सीखी? रात को भी उसे
बार-बार यही ख्याल सताता रहा।
आधी
रात के समीप एकाएक प्रकाश की नींद टूटी। लालटेन जल रही है और करुणा बैठी रो रही
है। उठ बैठा और बोला—अम्मॉँ, अभी तुम सोई नहीं?
करूणा
ने मुँह फेरकर कहा—नींद नहीं आई। तुम
कैसे जग गए? प्यास तो नही लगी है?
प्रकाश—नही अम्मॉँ, न जाने क्यों ऑंख खुल गई—मुझसे आज बड़ा अपराध हुआ, अम्मॉँ !
करूणा
ने उसके मुख की ओर स्नेह के नेत्रों से देखा।
प्रकाश—मैंने आज बुढ़िया के साथ बड़ी नटखट की।
मुझे क्षमा करो, फिर कभी ऐसी शरारत न
करूँगा।
यह
कहकर रोने लगा। करूणा ने स्नेहार्द्र होकर उसे गले लगा लिया और उसके कपोलों का
चुम्बन करके बोली—बेटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे हो या
तुम्हारे मन में सचमुच पछतावा हो रहा है?
प्रकाश
ने सिसकते हुए कहा—नहीं, अम्मॉँ, मुझे
दिल से अफसोस हो रहा है। अबकी वह बुढ़िया आएगी,
तो
में उसे बहुत-से पैसे दूँगा।
करूणा
का हृदय मतवाला हो गया। ऐसा जान पड़ा, आदित्य सामने खड़े
बच्चे को आर्शीवाद दे रहे हैं और कह रहे हैं,
करूणा, क्षोभ मत कर, प्रकाश अपने पिता का नाम रोशन करेगा।
तेरी संपूर्ण कामनाँ पूरी हो जाएँगी।
3
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ले
|
किन प्रकाश के कर्म और वचन में मेल न था
और दिनों के साथ उसके चरित्र का अंग प्रत्यक्ष होता जाता था। जहीन था ही, विश्वविद्यालय से उसे वजीफे मिलते थे, करूणा भी उसकी यथेष्ट सहायता करती थी, फिर भी उसका खर्च पूरा न पड़ता था। वह
मितव्ययता और सरल जीवन पर विद्वत्ता से भरे हुए व्याख्यान दे सकता था, पर उसका रहन-सहन फैशन के अंधभक्तों से
जौ-भर घटकर न था। प्रदर्शन की धुन उसे हमेशा सवार रहती थी। उसके मन और बुद्धि में
निरंतर द्वन्द्व होता रहता था। मन जाति की ओर था, बुद्धि
अपनी ओर। बुद्धि मन को दबाए रहती थी। उसके सामने मन की एक न चलती थी। जाति-सेवा
ऊसर की खेती है, वहॉँ बड़े-से-बड़ा
उपहार जो मिल सकता है, वह है गौरव और यश; पर वह भी स्थायी नहीं, इतना अस्थिर कि क्षण में जीवन-भर की
कमाई पर पानी फिर सकता है। अतएव उसका अन्त:करण अनिवार्य वेग के साथ विलासमय जीवन
की ओर झुकता था। यहां तक कि धीरे-धीरे उसे त्याग और निग्रह से घृणा होने लगी। वह
दुरवस्था और दरिद्रता को हेय समझता था। उसके हृदय न था, भाव न थे,
केवल मस्तिष्क था। मस्तिष्क में दर्द कहॉँ?
वहॉँ
तो तर्क हैं, मनसूबे हैं।
सिन्ध
में बाढ़ आई। हजारों आदमी तबाह हो गए। विद्यालय ने वहॉँ एक सेवा समिति भेजी।
प्रकाश के मन में द्वंद्व होने लगा—जाऊँ या न जाऊँ? इतने दिनों अगर वह परीक्षा की तैयारी
करे, तो प्रथम श्रेणी में
पास हो। चलते समय उसने बीमारी का बहाना कर दिया। करूणा ने लिखा, तुम सिन्ध न गये, इसका मुझे दुख है। तुम बीमार रहते हुए
भी वहां जा सकते थे। समिति में चिकित्सक भी तो थे! प्रकाश ने पत्र का उत्तर न
दिया।
उड़ीसा
में अकाल पड़ा। प्रजा मक्खियों की तरह मरने लगी। कांग्रेस ने पीड़ितो के लिए एक
मिशन तैयार किया। उन्हीं दिनों विद्यालयों ने इतिहास के छात्रों को ऐतिहासिक खोज
के लिए लंका भेजने का निश्चय किया। करूणा ने प्रकाश को लिखा—तुम उड़ीसा जाओ। किन्तु प्रकाश लंका
जाने को लालायित था। वह कई दिन इसी दुविधा में रहा। अंत को सीलोन ने उड़ीसा पर
विजय पाई। करुणा ने अबकी उसे कुछ न लिखा। चुपचाप रोती रही।
सीलोन
से लौटकर प्रकाश छुट्टियों में घर गया। करुणा उससे खिंची-खिंची रहीं। प्रकाश मन
में लज्जित हुआ और संकल्प किया कि अबकी कोई अवसर आया, तो अम्मॉँ को अवश्य प्रसन्न करूँगा। यह
निश्चय करके वह विद्यालय लौटा। लेकिन यहां आते ही फिर परीक्षा की फिक्र सवार हो
गई। यहॉँ तक कि परीक्षा के दिन आ गए; मगर इम्तहान से फुरसत
पाकर भी प्रकाश घर न गया। विद्यालय के एक अध्यापक काश्मीर सैर करने जा रहे थे।
प्रकाश उन्हीं के साथ काश्मीर चल खड़ा हुआ। जब परीक्षा-फल निकला और प्रकाश प्रथम
आया, तब उसे घर की याद आई!
उसने तुरन्त करूणा को पत्र लिखा और अपने आने की सूचना दी। माता को प्रसन्न करने के
लिए उसने दो-चार शब्द जाति-सेवा के विषय में भी लिखे—अब मै आपकी आज्ञा का पालन करने को तैयार
हूँ। मैंने शिक्षा-सम्बन्धी कार्य करने का निश्चक किया हैं इसी विचार से मेंने वह
विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। हमारे नेता भी तो विद्यालयों के आचार्यो ही का
सम्मान करते हें। अभी वक इन उपाधियों के मोह से वे मुक्त नहीं हुए हे। हमारे नेता
भी योग्यता, सदुत्साह, लगन का उतना सम्मान नहीं करते, जितना उपाधियों का! अब मेरी इज्जत
करेंगे और जिम्मेदारी को काम सौपेंगें, जो पहले मॉँगे भी न
मिलता।
करूणा
की आस फिर बँधी।
4
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वि
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द्यालय खुलते ही प्रकाश के नाम
रजिस्ट्रार का पत्र पहुँचा। उन्होंने प्रकाश का इंग्लैंड जाकर विद्याभ्यास करने के
लिए सरकारी वजीफे की मंजूरी की सूचना दी थी। प्रकाश पत्र हाथ में लिये हर्ष के
उन्माद में जाकर मॉँ से बोला—अम्मॉँ, मुझे इंग्लैंड जाकर पढ़ने के लिए सरकारी
वजीफा मिल गया।
करूणा
ने उदासीन भाव से पूछा—तो तुम्हारा क्या
इरादा है?
प्रकाश—मेरा इरादा? ऐसा अवसर पाकर भला कौन छोड़ता है!
करूणा—तुम तो स्वयंसेवकों में भरती होने जा
रहे थे?
प्रकाश—तो आप समझती हैं, स्वयंसेवक बन जाना ही जाति-सेवा है? मैं इंग्लैंड से आकर भी तो सेवा-कार्य
कर सकता हूँ और अम्मॉँ, सच पूछो, तो एक मजिस्ट्रेट अपने देश का जितना
उपकार कर सकता है, उतना एक हजार
स्वयंसेवक मिलकर भी नहीं कर सकते। मैं तो सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठूँगा और
मुझे विश्वास है कि सफल हो जाऊँगा।
करूणा
ने चकित होकर पूछा-तो क्या तुम मजिस्ट्रेट हो जाओगे?
प्रकाश—सेवा-भाव रखनेवाला एक मजिस्ट्रेट
कांग्रेस के एक हजार सभापतियों से ज्यादा उपकार कर सकता है। अखबारों में उसकी
लम्बी-लम्बी तारीफें न छपेंगी, उसकी वक्तृताओं पर
तालियॉँ न बजेंगी, जनता उसके जुलूस की
गाड़ी न खींचेगी और न विद्यालयों के छात्र उसको अभिनंदन-पत्र देंगे; पर सच्ची सेवा मजिस्ट्रेट ही कर सकता
है।
करूणा
ने आपत्ति के भाव से कहा—लेकिन यही मजिस्ट्रेट
तो जाति के सेवकों को सजाऍं देते हें, उन पर गोलियॉँ चलाते
हैं?
प्रकाश—अगर मजिस्ट्रेट के हृदय में परोपकार का
भाव है, तो वह नरमी से वही
काम करता है, जो दूसरे गोलियॉँ
चलाकर भी नहीं कर सकते।
करूणा—मैं यह नहीं मानूँगी। सरकार अपने नौकरों
को इतनी स्वाधीनता नहीं देती। वह एक नीति बना देती है और हरएक सरकारी नौकर को उसका
पालन करना पड़ता है। सरकार की पहली नीति यह है कि वह दिन-दिन अधिक संगठित और दृढ़
हों। इसके लिए स्वाधीनता के भावों का दमन करना जरूरी है; अगर कोई मजिस्ट्रेट इस नीति के विरूद्ध
काम करता है, तो वह मजिस्ट्रेट न
रहेगा। वह हिन्दुस्तानी था, जिसने तुम्हारे
बाबूजी को जरा-सी बात पर तीन साल की सजा दे दी। इसी सजा ने उनके प्राण लिये बेटा, मेरी इतनी बात मानो। सरकारी पदों पर न
गिरो। मुझे यह मंजूर है कि तुम मोटा खाकर और मोटा पहनकर देश की कुछ सेवा करो, इसके बदले कि तुम हाकिम बन जाओ और शान
से जीवन बिताओ। यह समझ लो कि जिस दिन तुम हाकिम की कुरसी पर बैठोगे, उस दिन से तुम्हारा दिमाग हाकिमों का-सा
हो जाएगा। तुम यही चाहेगे कि अफसरों में तुम्हारी नेकनामी और तरक्की हो। एक गँवारू
मिसाल लो। लड़की जब तक मैके में क्वॉँरी रहती है, वह
अपने को उसी घर की समझती है, लेकिन जिस दिन
ससुराल चली जाती है, वह अपने घर को दूसरो
का घर समझने लगती है। मॉँ-बाप, भाई-बंद सब वही रहते
हैं, लेकिन वह घर अपना
नहीं रहता। यही दुनिया का दस्तूर है।
प्रकाश
ने खीझकर कहा—तो क्या आप यही चाहती
हैं कि मैं जिंदगी-भर चारों तरफ ठोकरें खाता फिरूँ?
करुणा
कठोर नेत्रों से देखकर बोली—अगर ठोकर खाकर आत्मा
स्वाधीन रह सकती है, तो मैं कहूँगी, ठोकर खाना अच्छा है।
प्रकाश
ने निश्चयात्मक भाव से पूछा—तो आपकी यही इच्छा है?
करूणा
ने उसी स्वर में उत्तर दिया—हॉँ, मेरी यही इच्छा है।
प्रकाश
ने कुछ जवाब न दिया। उठकर बाहर चला गया और तुरन्त रजिस्ट्रार को इनकारी-पत्र लिख
भेजा; मगर उसी क्षण से
मानों उसके सिर पर विपत्ति ने आसन जमा लिया। विरक्त और विमन अपने कमरें में पड़ा
रहता, न कहीं घूमने जाता, न किसी से मिलता। मुँह लटकाए भीतर आता
और फिर बाहर चला जाता, यहॉँ तक महीना गुजर
गया। न चेहरे पर वह लाली रही, न वह ओज; ऑंखें अनाथों के मुख की भाँति याचना से
भरी हुई, ओठ हँसना भूल गए, मानों उन इनकारी-पत्र के साथ उसकी सारी
सजीवता, और चपलता, सारी सरलता बिदा हो गई। करूणा उसके
मनोभाव समझती थी और उसके शोक को भुलाने की चेष्टा करती थी, पर रूठे देवता प्रसन्न न होते थे।
आखिर
एक दिन उसने प्रकाश से कहा—बेटा, अगर तुमने विलायत जाने की ठान ही ली है, तो चले जाओ। मना न करूँगी। मुझे खेद है
कि मैंने तुम्हें रोका। अगर मैं जानती कि तुम्हें इतना आघात पहुँचेगा, तो कभी न रोकती। मैंने तो केवल इस विचार
से रोका था कि तुम्हें जाति-सेवा में मग्न देखकर तुम्हारे बाबूजी की आत्मा प्रसन्न
होगी। उन्होंने चलते समय यही वसीयत की थी।
प्रकाश
ने रूखाई से जवाब दिया—अब क्या जाऊँगा!
इनकारी-खत लिख चुका। मेरे लिए कोई अब तक बैठा थोड़े ही होगा। कोई दूसरा लड़का चुन
लिया होगा और फिर करना ही क्या है? जब आपकी मर्जी है कि
गॉँव-गॉँव की खाक छानता फिरूँ, तो वही सही।
करूणा
का गर्व चूर-चूर हो गया। इस अनुमति से उसने बाधा का काम लेना चाहा था; पर सफल न हुई। बोली—अभी कोई न चुना गया होगा। लिख दो, मैं जाने को तैयार हूं।
प्रकाश
ने झुंझलाकर कहा—अब कुछ नहीं हो सकता।
लोग हँसी उड़ाऍंगे। मैंने तय कर लिया है कि जीवन को आपकी इच्छा के अनुकूल बनाऊँगा।
करूणा—तुमने अगर शुद्ध मन से यह इरादा किया
होता, तो यों न रहते। तुम
मुझसे सत्याग्रह कर रहे हो; अगर मन को दबाकर, मुझे अपनी राह का काँटा समझकर तुमने
मेरी इच्छा पूरी भी की, तो क्या? मैं तो जब जानती कि तुम्हारे मन में
आप-ही-आप सेवा का भाव उत्पन्न होता। तुम आप ही रजिस्ट्रार साहब को पत्र लिख दो।
प्रकाश—अब मैं नहीं लिख सकता।
‘तो इसी शोक में तने बैठे रहोगे?’
‘लाचारी है।‘
करूणा
ने और कुछ न कहा। जरा देर में प्रकाश ने देखा कि वह कहीं जा रही है; मगर वह कुछ बोला नहीं। करूणा के लिए
बाहर आना-जाना कोई असाधारण बात न थी; लेकिन जब संध्या हो
गई और करुणा न आयी, तो प्रकाश को चिन्ता
होने लगी। अम्मा कहॉँ गयीं? यह प्रश्न बार-बार
उसके मन में उठने लगा।
प्रकाश
सारी रात द्वार पर बैठा रहा। भॉँति-भॉँति की शंकाऍं मन में उठने लगीं। उसे अब याद
आया, चलते समय करूणा कितनी
उदास थी; उसकी आंखे कितनी लाल
थी। यह बातें प्रकाश को उस समय क्यों न नजर आई?
वह
क्यों स्वार्थ में अंधा हो गया था?
हॉँ, अब प्रकाश को याद आया—माता ने साफ-सुथरे कपड़े पहने थे। उनके
हाथ में छतरी भी थी। तो क्या वह कहीं बहुत दूर गयी हैं? किससे पूछे? अनिष्ट के भय से प्रकाश रोने लगा।
श्रावण की अँधेरी
भयानक रात थी। आकाश में श्याम मेघमालाऍं, भीषण स्वप्न की भॉँति
छाई हुई थीं। प्रकाश रह-रहकार आकाश की ओर देखता था, मानो
करूणा उन्हीं मेघमालाओं में छिपी बैठी हे। उसने निश्चय किया, सवेरा होते ही मॉँ को खोजने चलूँगा और
अगर....
किसी ने द्वार
खटखटाया। प्रकाश ने दौड़कर खोल, तो देखा, करूणा खड़ी है। उसका मुख-मंडल इतना खोया
हुआ, इतना करूण था, जैसे आज ही उसका सोहाग उठ गया है, जैसे संसार में अब उसके लिए कुछ नहीं
रहा, जैसे वह नदी के
किनारे खड़ी अपनी लदी हुई नाव को डूबते देख रही है और कुछ कर नहीं सकती।
प्रकाश ने अधीर होकर
पूछा—अम्मॉँ कहॉँ चली गई
थीं? बहुत देर लगाई?
करूणा ने भूमि की ओर
ताकते हुए जवाब दिया—एक काम से गई थी। देर
हो गई।
यह कहते हुए उसने
प्रकाश के सामने एक बंद लिफाफा फेंक दिया। प्रकाश ने उत्सुक होकर लिफाफा उठा लिया।
ऊपर ही विद्यालय की मुहर थी। तुरन्त ही लिफाफा खोलकर पढ़ा। हलकी-सी लालिमा चेहरे
पर दौड़ गयी। पूछा—यह तुम्हें कहॉँ मिल
गया अम्मा?
करूणा—तुम्हारे रजिस्ट्रार के पास से लाई हूँ।
‘क्या तुम वहॉँ चली गई थी?’
‘और क्या करती।‘
‘कल तो गाड़ी का समय न था?’
‘मोटर ले ली थी।‘
प्रकाश एक क्षण तक
मौन खड़ा रहा, फिर कुंठित स्वर में
बोला—जब तुम्हारी इच्छा
नहीं है तो मुझे क्यों भेज रही हो?
करूणा ने विरक्त भाव
से कहा—इसलिए कि तुम्हारी
जाने की इच्छा है। तुम्हारा यह मलिन वेश नहीं देखा जाता। अपने जीवन के बीस वर्ष
तुम्हारी हितकामना पर अर्पित कर दिए; अब तुम्हारी
महत्त्वाकांक्षा की हत्या नहीं कर सकती। तुम्हारी यात्रा सफल हो, यही हमारी हार्दिक अभिलाषा है।
करूणा का कंठ रूँध
गया और कुछ न कह सकी।
5
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प्र
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काश उसी दिन से यात्रा की तैयारियॉँ
करने लगा। करूणा के पास जो कुछ था, वह सब खर्च हो गया।
कुछ ऋण भी लेना पड़ा। नए सूट बने, सूटकेस लिए गए।
प्रकाश अपनी धुन में मस्त था। कभी किसी चीज की फरमाइश लेकर
आता,
कभी
किसी चीज का।
करूणा
इस एक सप्ताह में इतनी दुर्बल हो गयी है, उसके बालों पर कितनी
सफेदी आ गयी है, चेहरे पर कितनी
झुर्रियॉँ पड़ गई हैं, यह उसे कुछ न नजर
आता। उसकी ऑंखों में इंगलैंड के दृश्य समाये हुए थे। महत्त्वाकांक्षा ऑंखों पर
परदा डाल देती है।
प्रस्थान
का दिन आया। आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी। करूणा स्वामी के पुराने कपड़ों को
बाहर निकाल रही थी। उनकी गाढ़े की चादरें, खद्दर के कुरते, पाजामें और लिहाफ अभी तक सन्दूक में
संचित थे। प्रतिवर्ष वे धूप में सुखाये जाते और झाड़-पोंछकर रख दिये जाते थे।
करूणा ने आज फिर उन कपड़ो को निकाला, मगर सुखाकर रखने के
लिए नहीं गरीबों में बॉँट देने के लिए। वह आज पति से नाराज है। वह लुटिया, डोर और घड़ी, जो आदित्य की चिरसंगिनी थीं और जिनकी
बीस वर्ष से करूणा ने उपासना की थी, आज निकालकर ऑंगन में
फेंक दी गई; वह झोली जो बरसों
आदित्य के कन्धों पर आरूढ़ रह चुकी थी, आप कूड़े में डाल दी
गई; वह चित्र जिसके सामने
बीस वर्ष से करूणा सिर झुकाती थी, आज वही निर्दयता से
भूमि पर डाल दिया गया। पति का कोई स्मृति-चिन्ह वह अब अपने घर में नहीं रखना
चाहती। उसका अन्त:करण शोक और निराशा से विदीर्ण हो गया है और पति के सिवा वह किस
पर क्रोध उतारे? कौन उसका अपना हैं? वह किससे अपनी व्यथा कहे? किसे अपनी छाती चीरकर दिखाए? वह होते तो क्या आप प्रकाश दासता की
जंजीर गले में डालकर फूला न समाता? उसे कौन समझाए कि
आदित्य भी इस अवसर पर पछताने के सिवा और कुछ न कर सकते।
प्रकाश
के मित्रों ने आज उसे विदाई का भोज दिया था। वहॉँ से वह संध्या समय कई मित्रों के
साथ मोटर पर लौटा। सफर का सामान मोटर पर रख दिया गया, तब वह अन्दर आकर मॉँ से बोला—अम्मा, जाता
हूँ। बम्बई पहूँचकर पत्र लिखूँगा। तुम्हें मेरी कसम, रोना
मत और मेरे खतों का जवाब बराबर देना।
जैसे
किसी लाश को बाहर निकालते समय सम्बन्धियों का धैर्य छूट जाता है, रूके हुए ऑंसू निकल पड़ते हैं और शोक की
तरंगें उठने लगती हैं, वही दशा करूणा की
हुई। कलेजे में एक हाहाकार हुआ, जिसने उसकी दुर्बल
आत्मा के एक-एक अणु को कंपा दिया। मालूम हुआ, पॉँव पानी में फिसल
गया है और वह लहरों में बही जा रही है। उसके मुख से शोक या आर्शीवाद का एक शब्द भी
न निकला। प्रकाश ने उसके चरण छुए, अश्रू-जल से माता के
चरणों को पखारा, फिर बाहर चला। करूणा
पाषाण मूर्ति की भॉँति खड़ी थी।
सहसा
ग्वाले ने आकर कहा—बहूजी, भइया चले गए। बहुत रोते थे।
तब करूणा की समाधि टूटी। देखा, सामने कोई नहीं है। घर में मृत्यु का-सा
सन्नाटा छाया हुआ है, और मानो हृदय की गति
बन्द हो गई है।
सहसा
करूणा की दृष्टि ऊपर उठ गई। उसने देखा कि आदित्य अपनी गोद में प्रकाश की निर्जीव
देह लिए खड़े हो रहे हैं। करूणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी।
6
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क
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रूणा जीवित थी, पर संसार से उसका कोई नाता न था। उसका
छोटा-सा संसार, जिसे उसने अपनी कल्पनाओं
के हृदय में रचा था, स्वप्न की भॉँति
अनन्त में विलीन हो गया था। जिस प्रकाश को सामने देखकर वह जीवन की अँधेरी रात में
भी हृदय में आशाओं की सम्पत्ति लिये जी रही थी,
वह
बुझ गया और सम्पत्ति लुट गई। अब न कोई आश्रय था और न उसकी जरूरत। जिन गउओं को वह
दोनों वक्त अपने हाथों से दाना-चारा देती और सहलाती थी, वे अब खूँटे पर बँधी निराश नेत्रों से
द्वार की ओर ताकती रहती थीं। बछड़ो को गले लगाकर पुचकारने वाला अब कोई न था, जिसके लिए दुध दुहे, मुट्ठा निकाले। खानेवाला कौन था? करूणा ने अपने छोटे-से संसार को अपने ही
अंदर समेट लिया था।
किन्तु
एक ही सप्ताह में करूणा के जीवन ने फिर रंग बदला। उसका छोटा-सा संसार फैलते-फैलते
विश्वव्यापी हो गया। जिस लंगर ने नौका को तट से एक केन्द्र पर बॉँध रखा था, वह उखड़ गया। अब नौका सागर के अशेष
विस्तार में भ्रमण करेगी, चाहे वह उद्दाम
तरंगों के वक्ष में ही क्यों न विलीन हो जाए।
करूणा
द्वार पर आ बैठती और मुहल्ले-भर के लड़कों को जमा करके दूध पिलाती। दोपहर तक मक्खन
निकालती और वह मक्खन मुहल्ले के लड़के खाते। फिर भॉँति-भॉँति के पकवान बनाती और
कुत्तों को खिलाती। अब यही उसका नित्य का नियम हो गया। चिड़ियॉँ, कुत्ते, बिल्लियॉँ
चींटे-चीटियॉँ सब अपने हो गए। प्रेम का वह द्वार अब किसी के लिए बन्द न था। उस
अंगुल-भर जगह में, जो प्रकाश के लिए भी
काफी न थी, अब समस्त संसार समा
गया था।
एक
दिन प्रकाश का पत्र आया। करूणा ने उसे उठाकर फेंक दिया। फिर थोड़ी देर के बाद उसे
उठाकर फाड़ डाला और चिड़ियों को दाना चुगाने लगी; मगर
जब निशा-योगिनी ने अपनी धूनी जलायी और वेदनाऍं उससे वरदान मॉँगने के लिए विकल
हो-होकर चलीं, तो करूणा की मनोवेदना
भी सजग हो उठी—प्रकाश का पत्र पढ़ने
के लिए उसका मन व्याकुल हो उठा। उसने सोचा,
प्रकाश
मेरा कौन है? मेरा उससे क्य
प्रयोजन? हॉँ, प्रकाश मेरा कौन है? हाँ,
प्रकाश
मेरा कौन है? हृदय ने उत्तर दिया, प्रकाश तेरा सर्वस्व है, वह तेरे उस अमर प्रेम की निशानी है, जिससे तू सदैव के लिए वंचित हो गई। वह तेरे प्राण है, तेरे जीवन-दीपक का प्रकाश, तेरी वंचित कामनाओं का माधुर्य, तेरे अश्रूजल में विहार करने वाला करने
वाला हंस। करूणा उस पत्र के टुकड़ों को जमा करने लगी, माना उसके प्राण बिखर गये हों। एक-एक
टुकड़ा उसे अपने खोये हुए प्रेम का एक पदचिन्ह-सा मालूम होता था। जब सारे पुरजे
जमा हो गए, तो करूणा दीपक के
सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय
प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो। हाय री ममता! वह अभागिन सारी रात उन
पुरजों को जोड़ने में लगी रही। पत्र दोनों ओर लिखा था, इसलिए पुरजों को ठीक स्थान पर रखना और
भी कठिन था। कोई शब्द, कोई वाक्य बीच में
गायब हो जाता। उस एक टुकड़े को वह फिर खोजने लगती। सारी रात बीत गई, पर पत्र अभी तक अपूर्ण था।
दिन
चढ़ आया, मुहल्ले के लौंड़े
मक्खन और दूध की चाह में एकत्र हो गए, कुत्तों ओर बिल्लियों
का आगमन हुआ, चिड़ियॉँ आ-आकर आंगन
में फुदकने लगीं, कोई ओखली पर बैठी, कोई तुलसी के चौतरे पर, पर करूणा को सिर उठाने तक की फुरसत
नहीं।
दोपहर
हुआ, करुणा ने सिर न
उठाया। न भूख थीं, न प्यास। फिर संध्या
हो गई। पर वह पत्र अभी तक अधूरा था। पत्र का आशय समझ में आ रहा था—प्रकाश का जहाज कहीं-से-कहीं जा रहा है।
उसके हृदय में कुछ उठा हुआ है। क्या उठा हुआ है, यह
करुणा न सोच सकी? करूणा पुत्र की लेखनी
से निकले हुए एक-एक शब्द को पढ़ना और उसे हृदय पर अंकित कर लेना चाहती थी।
इस
भॉँति तीन दिन गूजर गए। सन्ध्या हो गई थी। तीन दिन की जागी ऑंखें जरा झपक गई।
करूणा ने देखा, एक लम्बा-चौड़ा कमरा
है, उसमें मेजें और
कुर्सियॉँ लगी हुई हैं, बीच में ऊँचे मंच पर
कोई आदमी बैठा हुआ है। करूणा ने ध्यान से देखा,
प्रकाश
था।
एक
क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया, उसके हाथ-पॉँव में
जंजीर थी, कमर झुकी हुई, यह आदित्य थे।
करूणा
की आंखें खुल गई। ऑंसू बहने लगे। उसने पत्र के टुकड़ों को फिर समेट लिया और उसे
जलाकर राख कर डाला। राख की एक चुटकी के सिवा वहॉँ कुछ न रहा, जो उसके हृदय में विदीर्ण किए डालती थी।
इसी एक चुटकी राख में उसका गुड़ियोंवाला बचपन,
उसका
संतप्त यौवन और उसका तृष्णामय वैधव्य सब समा गया।
प्रात:काल
लोगों ने देखा, पक्षी पिंजड़े में उड़
चुका था! आदित्य का चित्र अब भी उसके शून्य हृदय से चिपटा हुआ था। भग्नहृदय पति की
स्नेह-स्मृति में विश्राम कर रहा था और प्रकाश का जहाज योरप चला जा रहा था।
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