प्रेमचंद
ईश्वरीय न्याय
का
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नपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक
बड़े जमींदार थे। मुंशी सत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामिभक्त और
सच्चरित्र मनुष्य थे। लाखों रुपये की तहसील और हजारों मन अनाज का लेन-देन उनके हाथ
में था; पर कभी उनकी नियत
डावॉँडोल न होती। उनके सुप्रबंध से रियासत दिनोंदिन उन्नति करती जाती थी। ऐसे
कत्तर्व्यपरायण सेवक का जितना सम्मान होना चाहिए, उससे
अधिक ही होता था। दु:ख-सुख के प्रत्येक अवसर पर पंडित जी उनके साथ बड़ी उदारता से
पेश आते। धीरे-धीरे मुंशी जी का विश्वास इतना बढ़ा कि पंडित जी ने हिसाब-किताब का
समझना भी छोड़ दिया। सम्भव है, उनसे आजीवन इसी तरह
निभ जाती, पर भावी प्रबल है। प्रयाग
में कुम्भ लगा, तो पंडित जी भी स्नान
करने गये। वहॉँ से लौटकर फिर वे घर न आये। मालूम नहीं, किसी गढ़े में फिसल पड़े या कोई जल-जंतु
उन्हें खींच ले गया, उनका फिर कुछ पता ही
न चला। अब मुंशी सत्यनाराण के अधिकार और भी बढ़े। एक हतभागिनी विधवा और दो
छोटे-छोटे बच्चों के सिवा पंडित जी के घर में और कोई न था। अंत्येष्टि-क्रिया से
निवृत्त होकर एक दिन शोकातुर पंडिताइन ने उन्हें बुलाया और रोकर कहा—लाला, पंडित
जी हमें मँझधार में छोड़कर सुरपुर को सिधर गये,
अब
यह नैया तुम्ही पार लगाओगे तो लग सकती है। यह सब खेती तुम्हारी लगायी हुई है, इसे तुम्हारे ही ऊपर छोड़ती हूँ। ये
तुम्हारे बच्चे हैं, इन्हें अपनाओ। जब तक
मालिक जिये, तुम्हें अपना भाई
समझते रहे। मुझे विश्वास है कि तुम उसी तरह इस भार को सँभाले रहोगे।
सत्यनाराण
ने रोते हुए जवाब दिया—भाभी, भैया क्या उठ गये, मेरे तो भाग्य ही फूट गये, नहीं तो मुझे आदमी बना देते। मैं उन्हीं
का नमक खाकर जिया हूँ और उन्हीं की चाकरी में मरुँगा भी। आप धीरज रखें। किसी
प्रकार की चिंता न करें। मैं जीते-जी आपकी सेवा से मुँह न मोडूँगा। आप केवल इतना
कीजिएगा कि मैं जिस किसी की शिकायत करुँ, उसे डॉँट दीजिएगा; नहीं तो ये लोग सिर चढ़ जायेंगे।
2
इ
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स घटना के बाद कई वर्षो तक मुंशीजी ने
रियासत को सँभाला। वह अपने काम में बड़े कुशल थे। कभी एक कौड़ी का भी बल नहीं
पड़ा। सारे जिले में उनका सम्मान होने लगा। लोग पंडित जी को भूल-सा गये। दरबारों
और कमेटियों में वे सम्मिलित होते, जिले के अधिकारी
उन्हीं को जमींदार समझते। अन्य रईसों में उनका आदर था; पर मान-वृद्वि की महँगी वस्तु है। और
भानुकुँवरि, अन्य स्त्रियों के
सदृश पैसे को खूब पकड़ती। वह मनुष्य की मनोवृत्तियों से परिचित न थी। पंडित जी
हमेशा लाला जी को इनाम इकराम देते रहते थे। वे जानते थे कि ज्ञान के बाद ईमान का
दूसरा स्तम्भ अपनी सुदशा है। इसके सिवा वे खुद भी कभी कागजों की जॉँच कर लिया करते
थे। नाममात्र ही को सही, पर इस निगरानी का डर
जरुर बना रहता था; क्योंकि ईमान का सबसे
बड़ा शत्रु अवसर है। भानुकुँवरि इन बातों को जानती न थी। अतएव अवसर तथा
धनाभाव-जैसे प्रबल शत्रुओं के पंजे में पड़ कर मुंशीजी का ईमान कैसे बेदाग बचता?
कानपुर
शहर से मिला हुआ, ठीक गंगा के किनारे, एक बहुत आजाद और उपजाऊ गॉँव था। पंडित
जी इस गॉँव को लेकर नदी-किनारे पक्का घाट, मंदिर, बाग,
मकान
आदि बनवाना चाहते थे; पर उनकी यह कामना सफल
न हो सकी। संयोग से अब यह गॉँव बिकने लगा। उनके जमींदार एक ठाकुर साहब थे। किसी
फौजदारी के मामले में फँसे हुए थे। मुकदमा लड़ने के लिए रुपये की चाह थी। मुंशीजी
ने कचहरी में यह समाचार सुना। चटपट मोल-तोल हुआ। दोनों तरफ गरज थी। सौदा पटने में
देर न लगी, बैनामा लिखा गया।
रजिस्ट्री हुई। रुपये मौजूद न थे, पर शहर में साख थी।
एक महाजन के यहॉँ से तीस हजार रुपये मँगवाये गये और ठाकुर साहब को नजर किये गये।
हॉँ, काम-काज की आसानी के
खयाल से यह सब लिखा-पढ़ी मुंशीजी ने अपने ही नाम की;
क्योंकि मालिक के लड़के अभी नाबालिग थे। उनके नाम से लेने में बहुत झंझट होती और
विलम्ब होने से शिकार हाथ से निकल जाता। मुंशीजी बैनामा लिये असीम आनंद में मग्न
भानुकुँवरि के पास आये। पर्दा कराया और यह शुभ-समाचार सुनाया। भानुकुँवरि ने सजल नेत्रों से उनको धन्यवाद दिया। पंडित जी के नाम पर मन्दिर और घाट बनवाने का इरादा पक्का हो गया।
भानुकुँवरि के पास आये। पर्दा कराया और यह शुभ-समाचार सुनाया। भानुकुँवरि ने सजल नेत्रों से उनको धन्यवाद दिया। पंडित जी के नाम पर मन्दिर और घाट बनवाने का इरादा पक्का हो गया।
मुँशी
जी दूसरे ही दिन उस गॉँव में आये। आसामी नजराने लेकर नये स्वामी के स्वागत को
हाजिर हुए। शहर के रईसों की दावत हुई। लोगों के नावों पर बैठ कर गंगा की खूब सैर
की। मन्दिर आदि बनवाने के लिए आबादी से हट कर रमणीक स्थान चुना गया।
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य
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द्यपि इस गॉँव को अपने नाम लेते समय
मुंशी जी के मन में कपट का भाव न था, तथापि दो-चार दिन में
ही उनका अंकुर जम गया और धीरे-धीरे बढ़ने लगा। मुंशी जी इस गॉँव के आय-व्यय का
हिसाब अलग रखते और अपने स्वामिनों को उसका ब्योरो समझाने की जरुरत न समझते।
भानुकुँवरि इन बातों में दखल देना उचित न समझती थी; पर
दूसरे कारिंदों से बातें सुन-सुन कर उसे शंका होती थी कि कहीं मुंशी जी दगा तो न
देंगे। अपने मन का भाव मुंशी से छिपाती थी,
इस
खयाल से कि कहीं कारिंदों ने उन्हें हानि पहुँचाने के लिए यह षड़यंत्र न रचा हो।
इस
तरह कई साल गुजर गये। अब उस कपट के अंकुर ने वृक्ष का रुप धारण किया। भानुकुँवरि
को मुंशी जी के उस मार्ग के लक्षण दिखायी देने लगे। उधर मुंशी जी के मन ने कानून
से नीति पर विजय पायी, उन्होंने अपने मन में
फैसला किया कि गॉँव मेरा है। हॉँ, मैं भानुकुँवरि का
तीस हजार का ऋणी अवश्य हूँ। वे बहुत करेंगी तो अपने रुपये ले लेंगी और क्या कर
सकती हैं? मगर दोनों तरफ यह आग
अन्दर ही अन्दर सुलगती रही। मुंशी जी अस्त्रसज्जित होकर आक्रमण के इंतजार में थे
और भानुकुँवरि इसके लिए अवसर ढूँढ़ रही थी। एक दिन उसने साहस करके मुंशी जी को
अन्दर बुलाया और कहा—लाला जी ‘बरगदा’
के मन्दिर का काम कब से लगवाइएगा? उसे लिये आठ साल हो
गये, अब काम लग जाय तो
अच्छा हो। जिंदगी का कौन ठिकाना है, जो काम करना है; उसे कर ही डालना चाहिए।
इस
ढंग से इस विषय को उठा कर भानुकुँवरि ने अपनी चतुराई का अच्छा परिचय दिया। मुंशी
जी भी दिल में इसके कायल हो गये। जरा सोच कर बोले—इरादा
तो मेरा कई बार हुआ, पर मौके की जमीन नहीं
मिलती। गंगातट की जमीन असामियों के जोत में है और वे किसी तरह छोड़ने पर राजी
नहीं।
भानुकुँवरि—यह बात तो आज मुझे मालूम हुई। आठ साल
हुए, इस गॉँव के विषय में
आपने कभी भूल कर भी दी तो चर्चा नहीं की। मालूम नहीं, कितनी तहसील है, क्या मुनाफा है, कैसा गॉँव है, कुछ सीर होती है या नहीं। जो कुछ करते
हैं, आप ही करते हैं और
करेंगे। पर मुझे भी तो मालूम होना चाहिए?
मुंशी
जी सँभल उठे। उन्हें मालूम हो गया कि इस चतुर स्त्री से बाजी ले जाना मुश्किल है।
गॉँव लेना ही है तो अब क्या डर। खुल कर बोले—आपको इससे कोई सरोकार
न था, इसलिए मैंने व्यर्थ
कष्ट देना मुनासिब न समझा।
भानुकुँवरि
के हृदय में कुठार-सा लगा। पर्दे से निकल आयी और मुंशी जी की तरफ तेज ऑंखों से देख
कर बोली—आप क्या कहते हैं!
आपने गॉँव मेरे लिये लिया था या अपने लिए! रुपये मैंने दिये या आपने? उस पर जो खर्च पड़ा, वह मेरा था या आपका? मेरी समझ में नहीं आता कि आप कैसी बातें
करते हैं।
मुंशी
जी ने सावधानी से जवाब दिया—यह तो आप जानती हैं
कि गॉँव हमारे नाम से बसा हुआ है। रुपया जरुर आपका लगा, पर मैं उसका देनदार हूँ। रहा तहसील-वसूल
का खर्च, यह सब मैंने अपने पास
से दिया है। उसका हिसाब-किताब, आय-व्यय सब रखता गया
हूँ।
भानुकुँवरि
ने क्रोध से कॉँपते हुए कहा—इस कपट का फल आपको
अवश्य मिलेगा। आप इस निर्दयता से मेरे बच्चों का गला नहीं काट सकते। मुझे नहीं
मालूम था कि आपने हृदय में छुरी छिपा रखी है,
नहीं
तो यह नौबत ही क्यों आती। खैर, अब से मेरी रोकड़ और
बही खाता आप कुछ न छुऍं। मेरा जो कुछ होगा,
ले
लूँगी। जाइए, एकांत में बैठ कर
सोचिए। पाप से किसी का भला नहीं होता। तुम समझते होगे कि बालक अनाथ हैं, इनकी सम्पत्ति हजम कर लूँगा। इस भूल में
न रहना, मैं तुम्हारे घर की
ईट तक बिकवा लूँगी।
यह
कहकर भानुकुँवरि फिर पर्दे की आड़ में आ बैठी और रोने लगी। स्त्रियॉँ क्रोध के बाद
किसी न किसी बहाने रोया करती हैं। लाला साहब को कोई जवाब न सूझा। यहॉँ से उठ आये
और दफ्तर जाकर कागज उलट-पलट करने लगे, पर भानुकुँवरि भी
उनके पीछे-पीछे दफ्तर में पहुँची और डॉँट कर बोली—मेरा
कोई कागज मत छूना। नहीं तो बुरा होगा। तुम विषैले साँप हो, मैं तुम्हारा मुँह नहीं देखना चाहती।
मुंशी जी कागजों में
कुछ काट-छॉँट करना चाहते थे, पर विवश हो गये।
खजाने की कुन्जी निकाल कर फेंक दी, बही-खाते पटक दिये, किवाड़ धड़ाके-से बंद किये और हवा की
तरह सन्न-से निकल गये। कपट में हाथ तो डाला,
पर
कपट मन्त्र न जाना।
दूसरें
कारिंदों ने यह कैफियत सुनी, तो फूले न समाये।
मुंशी जी के सामने उनकी दाल न गलने पाती। भानुकुँवरि के पास आकर वे आग पर तेल
छिड़कने लगे। सब लोग इस विषय में सहमत थे कि मुंशी सत्यनारायण ने विश्वासघात किया
है। मालिक का नमक उनकी हड्डियों से फूट-फूट कर निकलेगा।
दोनों
ओर से मुकदमेबाजी की तैयारियॉँ होने लगीं! एक तरफ न्याय का शरीर था, दूसरी ओर न्याय की आत्मा। प्रकृति का
पुरुष से लड़ने का साहस हुआ।
भानकुँवरि
ने लाला छक्कन लाल से पूछा—हमारा वकील कौन है? छक्कन लाल ने इधर-उधर झॉँक कर कहा—वकील तो सेठ जी हैं, पर सत्यनारायण ने उन्हें पहले गॉँठ रखा
होगा। इस मुकदमें के लिए बड़े होशियार वकील की जरुरत है। मेहरा बाबू की आजकल खूब
चल रही है। हाकिम की कलम पकड़ लेते हैं। बोलते हैं तो जैसे मोटरकार छूट जाती है
सरकार! और क्या कहें, कई आदमियों को फॉँसी
से उतार लिया है, उनके सामने कोई वकील
जबान तो खोल नहीं सकता। सरकार कहें तो वही कर लिये जायँ।
छक्कन
लाल की अत्युक्ति से संदेह पैदा कर लिया। भानुकुँवरि ने कहा—नहीं, पहले
सेठ जी से पूछ लिया जाय। उसके बाद देखा जायगा। आप जाइए, उन्हें बुला लाइए।
छक्कनलाल
अपनी तकदीर को ठोंकते हुए सेठ जी के पास गये। सेठ जी पंडित भृगुदत्त के जीवन-काल
से ही उनका कानून-सम्बन्धी सब काम किया करते थे। मुकदमे का हाल सुना तो सन्नाटे
में आ गये। सत्यनाराण को यह बड़ा नेकनीयत आदमी समझते थे। उनके पतन से बड़ा खेद
हुआ। उसी वक्त आये। भानुकुँवरि ने रो-रो कर उनसे अपनी विपत्ति की कथा कही और अपने
दोनों लड़कों को उनके सामने खड़ा करके बोली—आप इन अनाथों की
रक्षा कीजिए। इन्हें मैं आपको सौंपती हूँ।
सेठ
जी ने समझौते की बात छेड़ी। बोले—आपस की लड़ाई अच्छी
नहीं।
भानुकुँवरि—अन्यायी के साथ लड़ना ही अच्छा है।
सेठ
जी—पर हमारा पक्ष निर्बल है।
भानुकुँवरि
फिर पर्दे से निकल आयी और विस्मित होकर बोली—क्या हमारा पक्ष
निर्बल है? दुनिया जानती है कि
गॉँव हमारा है। उसे हमसे कौन ले सकता है? नहीं, मैं
सुलह कभी न करुँगी, आप कागजों को देखें।
मेरे बच्चों की खातिर यह कष्ट उठायें। आपका परिश्रम निष्फल न जायगा। सत्यनारायण की
नीयत पहले खराब न थी। देखिए जिस मिती में गॉँव लिया गया है, उस मिती में तीस हजार का क्या खर्च
दिखाया गया है। अगर उसने अपने नाम उधार लिखा हो, तो
देखिए, वार्षिक सूद चुकाया
गया या नहीं। ऐसे नरपिशाच से मैं कभी सुलह न करुँगी।
सेठ
जी ने समझ लिया कि इस समय समझाने-बुझाने से कुछ काम न चलेगा। कागजात देखें, अभियोग चलाने की तैयारियॉँ होने लगीं।
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मुं
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शी सत्यनारायणलाल खिसियाये हुए मकान
पहुँचे। लड़के ने मिठाई मॉँगी। उसे पीटा। स्त्री पर इसलिए बरस पड़े कि उसने क्यों
लड़के को उनके पास जाने दिया। अपनी वृद्धा माता को डॉँट कर कहा—तुमसे इतना भी नहीं हो सकता कि जरा
लड़के को बहलाओ? एक तो मैं दिन-भर का
थका-मॉँदा घर आऊँ और फिर लड़के को खेलाऊँ? मुझे दुनिया में न और
कोई काम है, न धंधा। इस तरह घर
में बावैला मचा कर बाहर आये, सोचने लगे—मुझसे बड़ी भूल हुई। मैं कैसा मूर्ख
हूँ। और इतने दिन तक सारे कागज-पत्र अपने हाथ में थे। चाहता, कर सकता था, पर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहा। आज सिर पर
आ पड़ी, तो सूझी। मैं चाहता
तो बही-खाते सब नये बना सकता था, जिसमें इस गॉँव का और
रुपये का जिक्र ही न होता, पर मेरी मूर्खता के
कारण घर में आयी हुई लक्ष्मी रुठी जाती हैं। मुझे क्या मालूम था कि वह चुड़ैल
मुझसे इस तरह पेश आयेगी, कागजों में हाथ तक न
लगाने देगी।
इसी
उधेड़बुन में मुंशी जी एकाएक उछल पड़े। एक उपाय सूझ गया—क्यों न कार्यकर्त्ताओं को मिला लूँ? यद्यपि मेरी सख्ती के कारण वे सब मुझसे
नाराज थे और इस समय सीधे बात भी न करेंगे, तथापि उनमें ऐसा कोई
भी नहीं, जो प्रलोभन से मुठ्ठी
में न आ जाय। हॉँ, इसमें रुपये पानी की
तरह बहाना पड़ेगा, पर इतना रुपया आयेगा
कहॉँ से? हाय दुर्भाग्य? दो-चार दिन पहले चेत गया होता, तो कोई कठिनाई न पड़ती। क्या जानता था
कि वह डाइन इस तरह वज्र-प्रहार करेगी। बस, अब एक ही उपाय है।
किसी तरह कागजात गुम कर दूँ। बड़ी जोखिम का काम है, पर
करना ही पड़ेगा।
दुष्कामनाओं के सामने
एक बार सिर झुकाने पर फिर सँभलना कठिन हो जाता है। पाप के अथाह दलदल में जहॉँ एक
बार पड़े कि फिर प्रतिक्षण नीचे ही चले जाते हैं। मुंशी सत्यनारायण-सा विचारशील
मनुष्य इस समय इस फिक्र में था कि कैसे सेंध लगा पाऊँ!
मुंशी
जी ने सोचा—क्या सेंध लगाना आसान
है? इसके वास्ते कितनी
चतुरता, कितना साहब, कितनी बुद्वि, कितनी वीरता चाहिए! कौन कहता है कि चोरी
करना आसान काम है? मैं जो कहीं पकड़ा
गया, तो मरने के सिवा और
कोई मार्ग न रहेगा।
बहुत
सोचने-विचारने पर भी मुंशी जी को अपने ऊपर ऐसा दुस्साहस कर सकने का विश्वास न हो
सका। हॉँ, इसमें सुगम एक दूसरी
तदबीर नजर आयी—क्यों न दफ्तर में आग
लगा दूँ? एक बोतल मिट्टी का
तेल और दियासलाई की जरुरत हैं किसी बदमाश को मिला लूँ, मगर यह क्या मालूम कि वही उसी कमरे में
रखी है या नहीं। चुड़ैल ने उसे जरुर अपने पास रख लिया होगा। नहीं; आग लगाना गुनाह बेलज्जत होगा।
बहुत
देर मुंशी जी करवटें बदलते रहे। नये-नये मनसूबे सोचते; पर फिर अपने ही तर्को से काट देते।
वर्षाकाल में बादलों की नयी-नयी सूरतें बनती और फिर हवा के वेग से बिगड़ जाती हैं; वही दशा इस समय उनके मनसूबों की हो रही
थी।
पर
इस मानसिक अशांति में भी एक विचार पूर्णरुप से स्थिर था—किसी तरह इन कागजात को अपने हाथ में
लाना चाहिए। काम कठिन है—माना! पर हिम्मत न थी, तो रार क्यों मोल ली? क्या तीस हजार की जायदाद दाल-भात का कौर
है?—चाहे जिस तरह हो, चोर बने बिना काम नहीं चल सकता। आखिर जो
लोग चोरियॉँ करते हैं, वे भी तो मनुष्य ही
होते हैं। बस, एक छलॉँग का काम है।
अगर पार हो गये, तो राज करेंगे, गिर पड़े, तो
जान से हाथ धोयेंगे।
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रा
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त के दस बज गये। मुंशी सत्यनाराण
कुंजियों का एक गुच्छा कमर में दबाये घर से बाहर निकले। द्वार पर थोड़ा-सा पुआल
रखा हुआ था। उसे देखते ही वे चौंक पड़े। मारे डर के छाती धड़कने लगी। जान पड़ा कि
कोई छिपा बैठा है। कदम रुक गये। पुआल की तरफ ध्यान से देखा। उसमें बिलकुल हरकत न
हुई! तब हिम्मत बॉँधी, आगे बड़े और मन को
समझाने लगे—मैं कैसा बौखल हूँ
अपने
द्वार पर किसका डर और सड़क पर भी मुझे किसका डर है? मैं
अपनी राह जाता हूँ। कोई मेरी तरफ तिरछी ऑंख से नहीं देख सकता। हॉँ, जब मुझे सेंध लगाते देख ले—नहीं, पकड़
ले तब अलबत्ते डरने की बात है। तिस पर भी बचाव की युक्ति निकल सकती है।
अकस्मात
उन्होंने भानुकुँवरि के एक चपरासी को आते हुए देखा। कलेजा धड़क उठा। लपक कर एक
अँधेरी गली में घुस गये। बड़ी देर तक वहॉँ खड़े रहे। जब वह सिपाही ऑंखों से ओझल हो
गया, तब फिर सड़क पर आये।
वह सिपाही आज सुबह तक इनका गुलाम था, उसे उन्होंने कितनी
ही बार गालियॉँ दी थीं, लातें मारी थीं, पर आज उसे देखकर उनके प्राण सूख गये।
उन्होंने
फिर तर्क की शरण ली। मैं मानों भंग खाकर आया हूँ। इस चपरासी से इतना डरा मानो कि
वह मुझे देख लेता, पर मेरा कर क्या सकता
था? हजारों आदमी रास्ता
चल रहे हैं। उन्हीं में मैं भी एक हूँ। क्या वह अंतर्यामी है? सबके हृदय का हाल जानता है? मुझे देखकर वह अदब से सलाम करता और वहॉँ
का कुछ हाल भी कहता; पर मैं उससे ऐसा डरा
कि सूरत तक न दिखायी। इस तरह मन को समझा कर वे आगे बढ़े। सच है, पाप के पंजों में फँसा हुआ मन पतझड़ का
पत्ता है, जो हवा के जरा-से
झोंके से गिर पड़ता है।
मुंशी
जी बाजार पहुँचे। अधिकतर दूकानें बंद हो चुकी थीं। उनमें सॉँड़ और गायें बैठी हुई
जुगाली कर रही थी। केवल हलवाइयों की दूकानें खुली थी और कहीं-कहीं गजरेवाले हार की
हॉँक लगाते फिरते थे। सब हलवाई मुंशी जी को पहचानते थे, अतएव मुंशी जी ने सिर झुका लिया। कुछ
चाल बदली और लपकते हुए चले। एकाएक उन्हें एक बग्घी आती दिखायी दी। यह सेठ बल्लभदास
सवकील की बग्घी थी। इसमें बैठकर हजारों बार सेठ जी के साथ कचहरी गये थे, पर आज वह बग्घी कालदेव के समान भयंकर
मालूम हुई। फौरन एक खाली दूकान पर चढ़ गये। वहॉँ विश्राम करने वाले सॉँड़ ने समझा, वे मुझे पदच्युत करने आये हैं! माथा
झुकाये फुंकारता हुआ उठ बैठा; पर इसी बीच में बग्घी
निकल गयी और मुंशी जी की जान में जान आयी। अबकी उन्होंने तर्क का आश्रय न लिया।
समझ गये कि इस समय इससे कोई लाभ नहीं, खैरियत यह हुई कि
वकील ने देखा नहीं। यह एक घाघ हैं। मेरे चेहरे से ताड़ जाता।
कुछ
विद्वानों का कथन है कि मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति पाप की ओर होती है, पर यह कोरा अनुमान ही अनुमान है, अनुभव-सिद्ध बात नहीं। सच बात तो यह है
कि मनुष्य स्वभावत: पाप-भीरु होता है और हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि पाप से उसे
कैसी घृणा होती है।
एक
फर्लांग आगे चल कर मुंशी जी को एक गली मिली। वह भानुकुँवरि के घर का एक रास्ता था।
धुँधली-सी लालटेन जल रही थी। जैसा मुंशी जी ने अनुमान किया था, पहरेदार का पता न था। अस्तबल में चमारों
के यहॉँ नाच हो रहा था। कई चमारिनें बनाव-सिंगार करके नाच रही थीं। चमार मृदंग
बजा-बजा कर गाते थे—
‘नाहीं घरे श्याम, घेरि आये बदरा।
सोवत
रहेउँ, सपन एक देखेउँ, रामा।
खुलि
गयी नींद, ढरक गये कजरा।
नाहीं
घरे श्याम, घेरि आये बदरा।’
दोनों
पहरेदार वही तमाशा देख रहे थे। मुंशी जी दबे-पॉँव लालटेन के पास गए और जिस तरह बिल्ली
चूहे पर झपटती है, उसी तरह उन्होंने झपट
कर लालटेन को बुझा दिया। एक पड़ाव पूरा हो गया,
पर
वे उस कार्य को जितना दुष्कर समझते थे, उतना न जान पड़ा।
हृदय कुछ मजबूत हुआ। दफ्तर के बरामदे में पहुँचे और खूब कान लगाकर आहट ली। चारों
ओर सन्नाटा छाया हुआ था। केवल चमारों का कोलाहल सुनायी देता था। इस समय मुंशी जी
के दिल में धड़कन थी, पर सिर धमधम कर रहा
था; हाथ-पॉँव कॉँप रहे थे, सॉँस बड़े वेग से चल रही थी। शरीर का
एक-एक रोम ऑंख और कान बना हुआ था। वे सजीवता की मूर्ति हो रहे थे। उनमें जितना
पौरुष, जितनी चपलता, जितना-साहस, जितनी चेतना, जितनी बुद्वि, जितना औसान था, वे सब इस वक्त सजग और सचेत होकर
इच्छा-शक्ति की सहायता कर रहे थे।
दफ्तर
के दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा हुआ था। इसकी कुंजी आज बहुत तलाश करके वे बाजार
से लाये थे। ताला खुल गया, किवाड़ो ने बहुत दबी
जबान से प्रतिरोध किया। इस पर किसी ने ध्यान न दिया। मुंशी जी दफ्तर में दाखिल
हुए। भीतर चिराग जल रहा था। मुंशी जी को देख कर उसने एक दफे सिर हिलाया, मानो उन्हें भीतर आने से रोका।
मुंशी
जी के पैर थर-थर कॉँप रहे थे। एड़ियॉँ जमीन से उछली पड़ती थीं। पाप का बोझ उन्हें असह्य था।
पल-भर
में मुंशी जी ने बहियों को उलटा-पलटा। लिखावट उनकी ऑंखों में तैर रही थी। इतना
अवकाश कहॉँ था कि जरुरी कागजात छॉँट लेते। उन्होंनें सारी बहियों को समेट कर एक
गट्ठर बनाया और सिर पर रख कर तीर के समान कमरे के बाहर निकल आये। उस पाप की गठरी
को लादे हुए वह अँधेरी गली से गायब हो गए।
तंग, अँधेरी, दुर्गन्धपूर्ण
कीचड़ से भरी हुई गलियों में वे नंगे पॉँव,
स्वार्थ, लोभ और कपट का बोझ लिए चले जाते थे।
मानो पापमय आत्मा नरक की नालियों में बही चली जाती थी।
बहुत
दूर तक भटकने के बाद वे गंगा किनारे पहुँचे। जिस तरह कलुषित हृदयों में कहीं-कहीं
धर्म का धुँधला प्रकाश रहता है, उसी तरह नदी की काली
सतह पर तारे झिलमिला रहे थे। तट पर कई साधु धूनी जमाये पड़े थे। ज्ञान की ज्वाला
मन की जगह बाहर दहक रही थी। मुंशी जी ने अपना गट्ठर उतारा और चादर से खूब मजबूत
बॉँध कर बलपूर्वक नदी में फेंक दिया। सोती हुई लहरों में कुछ हलचल हुई और फिर
सन्नाटा हो गया।
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मुं
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शी सतयनाराणलाल के घर में दो स्त्रियॉँ
थीं—माता और पत्नी। वे
दोनों अशिक्षिता थीं। तिस पर भी मुंशी जी को गंगा में डूब मरने या कहीं भाग जाने
की जरुरत न होती थी ! न वे बॉडी पहनती थी, न मोजे-जूते, न हारमोनियम पर गा सकती थी। यहॉँ तक कि
उन्हें साबुन लगाना भी न आता था। हेयरपिन, ब्रुचेज, जाकेट आदि परमावश्यक चीजों का तो नाम ही
नहीं सुना था। बहू में आत्म-सम्मान जरा भी नहीं था; न
सास में आत्म-गौरव का जोश। बहू अब तक सास की घुड़कियॉँ भीगी बिल्ली की तरह सह लेती
थी—हा मूर्खे ! सास को बच्चे के
नहलाने-धुलाने, यहॉँ तक कि घर में
झाड़ू देने से भी घृणा न थी, हा ज्ञानांधे! बहू
स्त्री क्या थी, मिट्टी का लोंदा थी।
एक पैसे की जरुरत होती तो सास से मॉँगती। सारांश यह कि दोनों स्त्रियॉँ अपने
अधिकारों से बेखबर, अंधकार में पड़ी हुई
पशुवत् जीवन व्यतीत करती थीं। ऐसी फूहड़ थी कि रोटियां भी अपने हाथों से बना लेती
थी। कंजूसी के मारे दालमोट, समोसे कभी बाजार से न
मँगातीं। आगरे वाले की दूकान की चीजें खायी होती तो उनका मजा जानतीं। बुढ़िया खूसट
दवा-दरपन भी जानती थी। बैठी-बैठी घास-पात कूटा करती।
मुंशी
जी ने मॉँ के पास जाकर कहा—अम्मॉँ ! अब क्या
होगा? भानुकुँवरि ने मुझे
जवाब दे दिया।
माता
ने घबरा कर पूछा—जवाब दे दिया?
मुंशी—हॉँ,
बिलकुल
बेकसूर!
माता—क्या बात हुई? भानुकुँवरि का मिजाज तो ऐसा न था।
मुंशी—बात कुछ न थी। मैंने अपने नाम से जो
गॉँव लिया था, उसे मैंने अपने
अधिकार में कर लिया। कल मुझसे और उनसे साफ-साफ बातें हुई। मैंने कह दिया कि गॉँव
मेरा है। मैंने अपने नाम से लिया है, उसमें तुम्हारा कोई
इजारा नहीं। बस, बिगड़ गयीं, जो मुँह में आया, बकती रहीं। उसी वक्त मुझे निकाल दिया और
धमका कर कहा—मैं तुमसे लड़ कर
अपना गॉँव ले लूँगी। अब आज ही उनकी तरफ से मेरे ऊपर मुकदमा दायर होगा; मगर इससे होता क्या है? गॉँव मेरा है। उस पर मेरा कब्जा है। एक
नहीं, हजार मुकदमें चलाएं, डिगरी मेरी होगी?
माता
ने बहू की तरफ मर्मांतक दृष्टि से देखा और बोली—क्यों
भैया? वह गॉँव लिया तो था
तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?
मुंशी—लिया था, तब
लिया था। अब मुझसे ऐसा आबाद और मालदार गॉँव नहीं छोड़ा जाता। वह मेरा कुछ नहीं कर
सकती। मुझसे अपना रुपया भी नहीं ले सकती। डेढ़ सौ गॉँव तो हैं। तब भी हवस नहीं
मानती।
माना—बेटा, किसी
के धन ज्यादा होता है, तो वह उसे फेंक थोड़े
ही देता है? तुमने अपनी नीयत
बिगाड़ी, यह अच्छा काम नहीं
किया। दुनिया तुम्हें क्या कहेगी? और दुनिया चाहे कहे
या न कहे, तुमको भला ऐसा करना
चाहिए कि जिसकी गोद में इतने दिन पले, जिसका इतने दिनों तक
नमक खाया, अब उसी से दगा करो? नारायण ने तुम्हें क्या नहीं दिया? मजे से खाते हो, पहनते हो, घर
में नारायण का दिया चार पैसा है, बाल-बच्चे हैं, और क्या चाहिए? मेरा कहना मानो, इस कलंक का टीका अपने माथे न लगाओ। यह
अपजस मत लो। बरक्कत अपनी कमाई में होती है;
हराम
की कौड़ी कभी नहीं फलती।
मुंशी—ऊँह! ऐसी बातें बहुत सुन चुका हूँ।
दुनिया उन पर चलने लगे, तो सारे काम बन्द हो
जायँ। मैंने इतने दिनों इनकी सेवा की, मेरी ही बदौलत
ऐसे-ऐसे चार-पॉँच गॉँव बढ़ गए। जब तक पंडित जी थे, मेरी
नीयत का मान था। मुझे ऑंख में धूल डालने की जरुरत न थी, वे आप ही मेरी खातिर कर दिया करते थे।
उन्हें मरे आठ साल हो गए; मगर मुसम्मात के एक
बीड़े पान की कसम खाता हूँ; मेरी जात से उनको
हजारों रुपये-मासिक की बचत होती थी। क्या उनको इतनी भी समझ न थी कि यह बेचारा, जो इतनी ईमानदारी से मेरा काम करता है, इस नफे में कुछ उसे भी मिलना चाहिए? यह कह कर न दो, इनाम कह कर दो, किसी तरह दो तो, मगर वे तो समझती थी कि मैंने इसे बीस
रुपये महीने पर मोल ले लिया है। मैंने आठ साल तक सब किया, अब क्या इसी बीस रुपये में गुलामी करता
रहूँ और अपने बच्चों को दूसरों का मुँह ताकने के लिए छोड़ जाऊँ? अब मुझे यह अवसर मिला है। इसे क्यों छोडूँ? जमींदारी की लालसा लिये हुए क्यों मरुँ? जब तक जीऊँगा, खुद खाऊँगा। मेरे पीछे मेरे बच्चे चैन
उड़ायेंगे।
माता
की ऑंखों में ऑंसू भर आये। बोली—बेटा, मैंने तुम्हारे मुँह से ऐसी बातें कभी
नहीं सुनी थीं, तुम्हें क्या हो गया
है? तुम्हारे आगे
बाल-बच्चे हैं। आग में हाथ न डालो।
बहू
ने सास की ओर देख कर कहा—हमको ऐसा धन न चाहिए, हम अपनी दाल-रोटी में मगन हैं।
मुंशी—अच्छी बात है, तुम लोग रोटी-दाल खाना, गाढ़ा पहनना, मुझे अब हल्वे-पूरी की इच्छा है।
माता—यह अधर्म मुझसे न देखा जायगा। मैं गंगा
में डूब मरुँगी।
पत्नी—तुम्हें यह सब कॉँटा बोना है, तो मुझे मायके पहुँचा दो, मैं अपने बच्चों को लेकर इस घर में न
रहूँगी!
मुंशी
ने झुँझला कर कहा—तुम लोगों की बुद्वि
तो भॉँग खा गयी है। लाखों सरकारी नौकर रात-दिन दूसरों का गला दबा-दबा कर रिश्वतें
लेते हैं और चैन करते हैं। न उनके बाल-बच्चों ही को कुछ होता है, न उन्हीं को हैजा पकड़ता है। अधर्म उनको
क्यों नहीं खा जाता, जो मुझी को खा जायगा।
मैंने तो सत्यवादियों को सदा दु:ख झेलते ही देखा है। मैंने जो कुछ किया है, सुख लूटूँगा। तुम्हारे मन में जो आये, करो।
प्रात:काल
दफ्तर खुला तो कागजात सब गायब थे। मुंशी छक्कनलाल बौखलाये से घर में गये और मालकिन
से पूछा—कागजात आपने उठवा लिए
हैं।
भानुकुँवरि
ने कहा—मुझे क्या खबर, जहॉँ आपने रखे होंगे, वहीं होंगे।
फिर
सारे घर में खलबली पड़ गयी। पहरेदारों पर मार पड़ने लगी। भानुकुँवरि को तुरन्त
मुंशी सत्यनारायण पर संदेह हुआ, मगर उनकी समझ में
छक्कनलाल की सहायता के बिना यह काम होना असम्भव था। पुलिस में रपट हुई। एक ओझा नाम
निकालने के लिए बुलाया गया। मौलवी साहब ने कुर्रा फेंका। ओझा ने बताया, यह किसी पुराने बैरी का काम है। मौलवी साहब
ने फरमाया, किसी घर के भेदिये ने
यह हरकत की है। शाम तक यह दौड़-धूप रही। फिर यह सलाह होने लगी कि इन कागजातों के
बगैर मुकदमा कैसे चले। पक्ष तो पहले से ही निर्बल था। जो कुछ बल था, वह इसी बही-खाते का था। अब तो सबूत भी
हाथ से गये। दावे में कुछ जान ही न रही, मगर भानकुँवरि ने कहा—बला से हार जाऍंगे। हमारी चीज कोई छीन
ले, तो हमारा धर्म है कि
उससे यथाशक्ति लड़ें, हार कर बैठना कायरों का काम है। सेठ जी (वकील) को इस
दुर्घटना का समाचार मिला तो उन्होंने भी यही कहा कि अब दावे में जरा भी जान नहीं
है। केवल अनुमान और तर्क का भरोसा है। अदालत ने माना तो माना, नहीं तो हार माननी पड़ेगी। पर
भानुकुँवरि ने एक न मानी। लखनऊ और इलाहाबाद से दो होशियार बैरिस्टिर बुलाये।
मुकदमा शुरु हो गया।
सारे
शहर में इस मुकदमें की धूम थी। कितने ही रईसों को भानुकुँवरि ने साथी बनाया था।
मुकदमा शुरु होने के समय हजारों आदमियों की भीड़ हो जाती थी। लोगों के इस खिंचाव
का मुख्य कारण यह था कि भानुकुँवरि एक पर्दे की आड़ में बैठी हुई अदालत की कारवाई
देखा करती थी, क्योंकि उसे अब अपने
नौकरों पर जरा भी विश्वास न था।
वादी
बैरिस्टर ने एक बड़ी मार्मिक वक्तृता दी। उसने सत्यनाराण की पूर्वावस्था का खूब
अच्छा चित्र खींचा। उसने दिखलाया कि वे कैसे स्वामिभक्त, कैसे कार्य-कुशल, कैसे कर्म-शील थे; और स्वर्गवासी पंडित भृगुदत्त का उस पर
पूर्ण विश्वास हो जाना, किस तरह स्वाभाविक
था। इसके बाद उसने सिद्ध किया कि मुंशी सत्यनारायण की आर्थिक व्यवस्था कभी ऐसी न
थी कि वे इतना धन-संचय करते। अंत में उसने मुंशी जी की स्वार्थपरता, कूटनीति, निर्दयता
और विश्वास-घातकता का ऐसा घृणोत्पादक चित्र खींचा कि लोग मुंशी जी को गोलियॉँ देने
लगे। इसके साथ ही उसने पंडित जी के अनाथ बालकों की दशा का बड़ा करूणोत्पादक वर्णन
किया—कैसे शोक और लज्जा की
बात है कि ऐसा चरित्रवान, ऐसा नीति-कुशल
मनुष्य इतना गिर जाय कि अपने स्वामी के अनाथ बालकों की गर्दन पर छुरी चलाने पर
संकोच न करे। मानव-पतन का ऐसा करुण, ऐसा हृदय-विदारक
उदाहरण मिलना कठिन है। इस कुटिल कार्य के परिणाम की दृष्टि से इस मनुष्य के पूर्व
परिचित सदगुणों का गौरव लुप्त हो जाता है। क्योंकि वे असली मोती नहीं, नकली कॉँच के दाने थे, जो केवल विश्वास जमाने के निमित्त
दर्शाये गये थे। वह केवल सुंदर जाल था, जो एक सरल हृदय और
छल-छंद से दूर रहने वाले रईस को फँसाने के लिए फैलाया गया था। इस नर-पशु का
अंत:करण कितना अंधकारमय, कितना कपटपूर्ण, कितना कठोर है; और इसकी दुष्टता कितनी घोर, कितनी अपावन है। अपने शत्रु के साथ दया
करना एक बार तो क्षम्य है, मगर इस मलिन हृदय
मनुष्य ने उन बेकसों के साथ दगा दिया है, जिन पर मानव-स्वभाव
के अनुसार दया करना उचित है! यदि आज हमारे पास बही-खाते मौजूद होते, अदालत पर सत्यनारायण की सत्यता स्पष्ट रुप से प्रकट हो जाती, पर मुंशी जी के बरखास्त होते ही दफ्तर
से उनका लुप्त हो जाना भी अदालत के लिए एक बड़ा सबूत है।
शहर
में कई रईसों ने गवाही दी, पर सुनी-सुनायी बातें
जिरह में उखड़ गयीं। दूसरे दिन फिर मुकदमा पेश हुआ।
प्रतिवादी
के वकील ने अपनी वक्तृता शुरु की। उसमें गंभीर विचारों की अपेक्षा हास्य का आधिक्य
था—यह एक विलक्षण न्याय-सिद्धांत है कि
किसी धनाढ़य मनुष्य का नौकर जो कुछ खरीदे, वह उसके स्वामी की
चीज समझी जाय। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी गवर्नमेंट को अपने कर्मचारियों की सारी
सम्पत्ति पर कब्जा कर लेना चाहिए। यह स्वीकार करने में हमको कोई आपत्ति नहीं कि हम
इतने रुपयों का प्रबंध न कर सकते थे और यह धन हमने स्वामी ही से ऋण लिया; पर हमसे ऋण चुकाने का कोई तकाजा न करके
वह जायदाद ही मॉँगी जाती है। यदि हिसाब के कागजात दिखलाये जायँ, तो वे साफ बता देंगे कि मैं सारा ऋण दे
चुका। हमारे मित्र ने कहा कि ऐसी अवस्था में बहियों का गुम हो जाना भी अदालत के
लिये एक सबूत होना चाहिए। मैं भी उनकी युक्ति का समर्थन करता हूँ। यदि मैं आपसे ऋण
ले कर अपना विवाह करुँ तो क्या मुझसे मेरी नव-विवाहित वधू को छीन लेंगे?
‘हमारे सुयोग मित्र ने हमारे ऊपर अनाथों
के साथ दगा करने का दोष लगाया है। अगर मुंशी सत्यनाराण की नीयत खराब होती, तो उनके लिए सबसे अच्छा अवसर वह था जब
पंडित भृगुदत्त का स्वर्गवास हुआ था। इतने विलम्ब की क्या जरुरत थी? यदि आप शेर को फँसा कर उसके बच्चे को
उसी वक्त नहीं पकड़ लेते, उसे बढ़ने और सबल
होने का अवसर देते हैं, तो मैं आपको
बुद्विमान न कहूँगा। यथार्थ बात यह है कि मुंशी सत्यनाराण ने नमक का जो कुछ हक था, वह पूरा कर दिया। आठ वर्ष तक तन-मन से
स्वामी के संतान की सेवा की। आज उन्हें अपनी साधुता का जो फल मिल रहा है, वह बहुत ही दु:खजनक और हृदय-विदारक है।
इसमें भानुकुँवरि का दोष नहीं। वे एक गुण-सम्पन्न महिला हैं; मगर अपनी जाति के अवगुण उनमें भी
विद्यमान हैं! ईमानदार मनुष्य स्वभावत: स्पष्टभाषी होता है; उसे अपनी बातों में नमक-मिर्च लगाने की
जरुरत नहीं होती। यही कारण है कि मुंशी जी के मृदुभाषी मातहतों को उन पर आक्षेप
करने का मौका मिल गया। इस दावे की जड़ केवल इतनी ही है, और कुछ नहीं। भानुकुँवरि यहॉँ उपस्थित
हैं। क्या वे कह सकती हैं कि इस आठ वर्ष की मुद्दत में कभी इस गॉँव का जिक्र उनके
सामने आया? कभी उसके हानि-लाभ, आय-व्यय, लेन-देन
की चर्चा उनसे की गयी? मान लीजिए कि मैं गवर्नमेंट का मुलाजिम
हूँ। यदि मैं आज दफ्तर में आकर अपनी पत्नी के आय-व्यय और अपने टहलुओं के टैक्सों
का पचड़ा गाने लगूँ, तो शायद मुझे शीघ्र
ही अपने पद से पृथक होना पड़े, और सम्भव है, कुछ दिनों तक बरेली की अतिथिशाला में भी
रखा जाऊँ। जिस गॉँव से भानुकुँवरि का सरोवार न था, उसकी
चर्चा उनसे क्यों की जाती?’
इसके
बाद बहुत से गवाह पेश हुए; जिनमें अधिकांश
आस-पास के देहातों के जमींदार थे। उन्होंने बयान किया कि हमने मुंशी सत्यनारायण
असामियों को अपनी दस्तखती रसीदें और अपने नाम से खजाने में रुपया दाखिल करते देखा
है।
इतने
में संध्या हो गयी। अदालत ने एक सप्ताह में फैसला सुनाने का हुक्म दिया।
7
स
|
त्यनाराण को अब अपनी जीत में कोई सन्देह
न था। वादी पक्ष के गवाह भी उखड़ गये थे और बहस भी सबूत से खाली थी। अब इनकी गिनती
भी जमींदारों में होगी और सम्भव है, यह कुछ दिनों में रईस
कहलाने लगेंगे। पर किसी न किसी कारण से अब शहर के गणमान्य पुरुषों से ऑंखें मिलाते
शर्माते थे। उन्हें देखते ही उनका सिर नीचा हो जाता था। वह मन में डरते थे कि वे
लोग कहीं इस विषय पर कुछ पूछ-ताछ न कर बैठें। वह बाजार में निकलते तो दूकानदारों
में कुछ कानाफूसी होने लगती और लोग उन्हें तिरछी दृष्टि से देखने लगते। अब तक लोग
उन्हें विवेकशील और सच्चरित्र मनुष्य समझते,
शहर
के धनी-मानी उन्हें इज्जत की निगाह से देखते और उनका बड़ा आदर करते थे। यद्यपि
मुंशी जी को अब तक इनसे टेढ़ी-तिरछी सुनने का संयोग न पड़ा था, तथापि उनका मन कहता था कि सच्ची बात
किसी से छिपी नहीं है। चाहे अदालत से उनकी जीत हो जाय, पर उनकी साख अब जाती रही। अब उन्हें लोग
स्वार्थी, कपटी और दगाबाज समझेंगे।
दूसरों की बात तो अलग रही, स्वयं उनके घरवाले
उनकी उपेक्षा करते थे। बूढ़ी माता ने तीन दिन से मुँह में पानी नहीं डाला! स्त्री
बार-बार हाथ जोड़ कर कहती थी कि अपने प्यारे बालकों पर दया करो। बुरे काम का फल
कभी अच्छा नहीं होता! नहीं तो पहले मुझी को विष खिला दो।
जिस
दिन फैसला सुनाया जानेवाला था, प्रात:काल एक
कुंजड़िन तरकारियॉँ लेकर आयी और मुंशियाइन से बोली—
‘बहू जी! हमने बाजार में एक बात सुनी है।
बुरा न मानों तो कहूँ? जिसको देखो, उसके मुँह से यही बात निकलती है कि लाला
बाबू ने जालसाजी से पंडिताइन का कोई हलका ले लिया। हमें तो इस पर यकीन नहीं आता।
लाला बाबू ने न सँभाला होता, तो अब तक पंडिताइन का
कहीं पता न लगता। एक अंगुल जमीन न बचती। इन्हीं में एक सरदार था कि सबको सँभाल
लिया। तो क्या अब उन्हीं के साथ बदी करेंगे?
अरे
बहू! कोई कुछ साथ लाया है कि ले जायगा? यही नेक-बदी रह जाती
है। बुरे का फल बुरा होता है। आदमी न देखे,
पर
अल्लाह सब कुछ देखता है।’
बहू
जी पर घड़ों पानी पड़ गया। जी चाहता था कि धरती फट जाती, तो उसमें समा जाती। स्त्रियॉँ स्वभावत:
लज्जावती होती हैं। उनमें आत्माभिमान की मात्रा अधिक होती है। निन्दा-अपमान उनसे
सहन नहीं हो सकता है। सिर झुकाये हुए बोली—बुआ! मैं इन बातों को
क्या जानूँ? मैंने तो आज ही
तुम्हारे मुँह से सुनी है। कौन-सी तरकारियॉँ हैं?
मुंशी
सत्यनारायण अपने कमरे में लेटे हुए कुंजड़िन की बातें सुन रहे थे, उसके चले जाने के बाद आकर स्त्री से
पूछने लगे—यह शैतान की खाला
क्या कह रही थी।
स्त्री
ने पति की ओर से मुंह फेर लिया और जमीन की ओर ताकते हुए बोली—क्या तुमने नहीं सुना? तुम्हारा गुन-गान कर रही थी। तुम्हारे
पीछे देखो, किस-किसके मुँह से ये
बातें सुननी पड़ती हैं और किस-किससे मुँह छिपाना पड़ता है।
मुंशी
जी अपने कमरे में लौट आये। स्त्री को कुछ उत्तर नहीं दिया। आत्मा लज्जा से परास्त
हो गयी। जो मनुष्य सदैव सर्व-सम्मानित रहा हो;
जो
सदा आत्माभिमान से सिर उठा कर चलता रहा हो,
जिसकी
सुकृति की सारे शहर में चर्चा होती हो, वह कभी सर्वथा
लज्जाशून्य नहीं हो सकता; लज्जा कुपथ की सबसे
बड़ी शत्रु है। कुवासनाओं के भ्रम में पड़ कर मुंशी जी ने समझा था, मैं इस काम को ऐसी गुप्त-रीति से पूरा
कर ले जाऊँगा कि किसी को कानों-कान खबर न होगी,
पर
उनका यह मनोरथ सिद्ध न हुआ। बाधाऍं आ खड़ी हुई। उनके हटाने में उन्हें बड़े
दुस्साहस से काम लेना पड़ा; पर यह भी उन्होंने
लज्जा से बचने के निमित्त किया। जिसमें यह कोई न कहे कि अपनी स्वामिनी को धोखा
दिया। इतना यत्न करने पर भी निंदा से न बच सके। बाजार का सौदा बेचनेवालियॉँ भी अब
अपमान करतीं हैं। कुवासनाओं से दबी हुई लज्जा-शक्ति इस कड़ी चोट को सहन न कर सकी। मुंशी जी सोचने लगे, अब मुझे धन-सम्पत्ति मिल जायगी, ऐश्वर्यवान् हो जाऊँगा, परन्तु निन्दा से मेरा पीछा न छूटेगा।
अदालत का फैसला मुझे लोक-निन्दा से न बचा सकेगा। ऐश्वर्य का फल क्या है?—मान और मर्यादा। उससे हाथ धो बैठा, तो ऐश्वर्य को लेकर क्या करुँगा? चित्त की शक्ति खोकर, लोक-लज्जा सहकर, जनसमुदाय में नीच बन कर और अपने घर में
कलह का बीज बोकर यह सम्पत्ति मेरे किस काम आयेगी? और
यदि वास्तव में कोई न्याय-शक्ति हो और वह मुझे इस कुकृत्य का दंड दे, तो मेरे लिए सिवा मुख में कालिख लगा कर
निकल जाने के और कोई मार्ग न रहेगा। सत्यवादी मनुष्य पर कोई विपत्त पड़ती हैं, तो लोग उनके साथ सहानुभूति करते हैं।
दुष्टों की विपत्ति लोगों के लिए व्यंग्य की सामग्री बन जाती है। उस अवस्था में
ईश्वर अन्यायी ठहराया जाता है; मगर दुष्टों की
विपत्ति ईश्वर के न्याय को सिद्ध करती है। परमात्मन! इस दुर्दशा से किसी तरह मेरा
उद्धार करो! क्यों न जाकर मैं भानुकुँवरि के पैरों पर गिर पड़ूँ और विनय करुँ कि
यह मुकदमा उठा लो? शोक! पहले यह बात
मुझे क्यों न सूझी? अगर कल तक में उनके
पास चला गया होता, तो बात बन जाती; पर अब क्या हो सकता है। आज तो फैसला
सुनाया जायगा।
मुंशी
जी देर तक इसी विचार में पड़े रहे, पर कुछ निश्चय न कर
सके कि क्या करें।
भानुकुँवरि
को भी विश्वास हो गया कि अब गॉँव हाथ से गया। बेचारी हाथ मल कर रह गयी। रात-भर उसे
नींद न आयी, रह-रह कर मुंशी
सत्यनारायण पर क्रोध आता था। हाय पापी! ढोल बजा कर मेरा पचास हजार का माल लिए जाता
है और मैं कुछ नहीं कर सकती। आजकल के न्याय करने वाले बिलकुल ऑंख के अँधे हैं। जिस
बात को सारी दुनिया जानती है, उसमें भी उनकी
दृष्टि नहीं पहुँचती। बस, दूसरों को ऑंखों से
देखते हैं। कोरे कागजों के गुलाम हैं। न्याय वह है जो दूध का दूध, पानी का पानी कर दे; यह नहीं कि खुद ही कागजों के धोखे में आ
जाय, खुद ही पाखंडियों के
जाल में फँस जाय। इसी से तो ऐसी छली, कपटी, दगाबाज, और
दुरात्माओं का साहस बढ़ गया है। खैर, गॉँव जाता है तो जाय; लेकिन सत्यनारायण, तुम शहर में कहीं मुँह दिखाने के लायक
भी न रहे।
इस
खयाल से भानुकुँवरि को कुछ शान्ति हुई। शत्रु की हानि मनुष्य को अपने लाभ से भी
अधिक प्रिय होती है, मानव-स्वभाव ही कुछ
ऐसा है। तुम हमारा एक गॉँव ले गये, नारायण चाहेंगे तो
तुम भी इससे सुख न पाओगे। तुम आप नरक की आग में जलोगे, तुम्हारे घर में कोई दिया जलाने वाला न
रह जायगा।
फैसले
का दिन आ गया। आज इजलास में बड़ी भीड़ थी। ऐसे-ऐसे महानुभाव उपस्थित थे, जो बगुलों की तरह अफसरों की बधाई और
बिदाई के अवसरों ही में नजर आया करते हैं। वकीलों और मुख्तारों की पलटन भी जमा थी।
नियत समय पर जज साहब ने इजलास सुशोभित किया। विस्तृत न्याय भवन में सन्नाटा छा
गया। अहलमद ने संदूक से तजबीज निकाली। लोग उत्सुक होकर एक-एक कदम और आगे खिसक गए।
जज
ने फैसला सुनाया—मुद्दई का दावा
खारिज। दोनों पक्ष अपना-अपना खर्च सह लें।
यद्यपि
फैसला लोगों के अनुमान के अनुसार ही था, तथापि जज के मुँह से
उसे सुन कर लोगों में हलचल-सी मच गयी। उदासीन भाव से फैसले पर आलोचनाऍं करते हुए
लोग धीरे-धीरे कमरे से निकलने लगे।
एकाएक
भानुकुँवरि घूँघट निकाले इजलास पर आ कर खड़ी हो गयी। जानेवाले लौट पड़े। जो बाहर
निकल गये थे, दौड़ कर आ गये। और
कौतूहलपूर्वक भानुकुँवरि की तरफ ताकने लगे।
भानुकुँवरि
ने कंपित स्वर में जज से कहा—सरकार, यदि हुक्म दें, तो मैं मुंशी जी से कुछ पूछूँ।
यद्यपि
यह बात नियम के विरुद्ध थी, तथापि जज ने
दयापूर्वक आज्ञा दे दी।
तब
भानुकुँवरि ने सत्यनारायण की तरफ देख कर कहा—लाला जी, सरकार ने तुम्हारी डिग्री तो कर ही दी।
गॉँव तुम्हें मुबारक रहे; मगर ईमान आदमी का सब
कुछ है। ईमान से कह दो, गॉँव किसका है?
हजारों
आदमी यह प्रश्न सुन कर कौतूहल से सत्यनारायण की तरफ देखने लगे। मुंशी जी
विचार-सागर में डूब गये। हृदय में संकल्प और विकल्प में घोर संग्राम होने लगा।
हजारों मनुष्यों की ऑंखें उनकी तरफ जमी हुई थीं। यथार्थ बात अब किसी से छिपी न थी।
इतने आदमियों के सामने असत्य बात मुँह से निकल न सकी। लज्जा से जबान बंद कर ली—‘मेरा’
कहने में काम बनता था। कोई बात न थी; किंतु घोरतम पाप का
दंड समाज दे सकता है, उसके मिलने का पूरा
भय था। ‘आपका’ कहने से काम बिगड़ता था। जीती-जितायी
बाजी हाथ से निकली जाती थी, सर्वोत्कृष्ट काम के
लिए समाज से जो इनाम मिल सकता है, उसके मिलने की पूरी
आशा थी। आशा के भय को जीत लिया। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे ईश्वर ने मुझे अपना मुख उज्जवल
करने का यह अंतिम अवसर दिया है। मैं अब भी मानव-सम्मान का पात्र बन सकता हूँ। अब
अपनी आत्मा की रक्षा कर सकता हूँ। उन्होंने आगे
बढ़ कर भानुकुँवरि को प्रणाम किया और कॉँपते हुए स्वर से बोले—आपका!
हजारों
मनुष्यों के मुँह से एक गगनस्पर्शी ध्वनि निकली—सत्य
की जय!
जज
ने खड़े होकर कहा—यह कानून का न्याय
नहीं, ईश्वरीय न्याय है!
इसे कथा न समझिएगा; यह सच्ची घटना है।
भानुकुँवरि और सत्य नारायण अब भी जीवित हैं। मुंशी जी के इस नैतिक साहस पर लोग
मुगध हो गए। मानवीय न्याय पर ईश्वरीय न्याय ने जो विलक्षण विजय पायी, उसकी चर्चा शहर भर में महीनों रही।
भानुकुँवरि मुंशी जी के घर गयी, उन्हें मना कर लायीं।
फिर अपना सारा कारोबार उन्हें सौंपा और कुछ दिनों उपरांत यह गॉँव उन्हीं के नाम
हिब्बा कर दिया। मुंशी जी ने भी उसे अपने अधिकार में रखना उचित न समझा, कृष्णार्पण कर दिया। अब इसकी आमदनी
दीन-दुखियों और विद्यार्थियों की सहायता में खर्च होती है।
ममता
बा
|
बू रामरक्षादास दिल्ली के एक
ऐश्वर्यशाली खत्री थे, बहुत ही ठाठ-बाट से
रहनेवाले। बड़े-बड़े अमीर उनके यहॉँ नित्य आते-आते थे। वे आयें हुओं का आदर-सत्कार
ऐसे अच्छे ढंग से करते थे कि इस बात की धूम सारे मुहल्ले में थी। नित्य उनके
दरवाजे पर किसी न किसी बहाने से इष्ट-मित्र एकत्र हो जाते, टेनिस खेलते, ताश उड़ता, हारमोनियम के मधुर स्वरों से जी बहलाते, चाय-पानी से हृदय प्रफुल्लित करते, अधिक और क्या चाहिए? जाति की ऐसी अमूल्य सेवा कोई छोटी बात
नहीं है। नीची जातियों के सुधार के लिये दिल्ली में एक सोसायटी थी। बाबू साहब उसके
सेक्रेटरी थे, और इस कार्य को
असाधारण उत्साह से पूर्ण करते थे। जब उनका बूढ़ा कहार बीमार हुआ और क्रिश्चियन
मिशन के डाक्टरों ने उसकी सुश्रुषा की, जब उसकी विधवा स्त्री
ने निर्वाह की कोई आशा न देख कर क्रिश्चियन-समाज का आश्रय लिया, तब इन दोनों अवसरों पर बाबू साहब ने शोक
के रेजल्यूशन्स पास किये। संसार जानता है कि सेक्रेटरी का काम सभाऍं करना और
रेजल्यूशन बनाना है। इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सकता।
मिस्टर
रामरक्षा का जातीय उत्साह यही तक सीमाबद्ध न था। वे सामाजिक कुप्रथाओं तथा
अंध-विश्वास के प्रबल शत्रु थे। होली के दिनों में जब कि मुहल्ले में चमार और कहार
शराब से मतवाले होकर फाग गाते और डफ बजाते हुए निकलते, तो उन्हें, बड़ा शोक होता। जाति की इस मूर्खता पर
उनकी ऑंखों में ऑंसू भर आते और वे प्रात: इस कुरीति का निवारण अपने हंटर से किया
करते। उनके हंटर में जाति-हितैषिता की उमंग उनकी वक्तृता से भी अधिक थी। यह उन्हीं
के प्रशंसनीय प्रयत्न थे, जिन्होंने मुख्य होली के दिन दिल्ली में
हलचल मचा दी, फाग गाने के अपराध
में हजारों आदमी पुलिस के पंजे में आ गये। सैकड़ों घरों में मुख्य होली के दिन
मुहर्रम का-सा शोक फैल गया। इधर उनके दरवाजे पर हजारों पुरुष-स्त्रियॉँ अपना
दुखड़ा रो रही थीं। उधर बाबू साहब के हितैषी मित्रगण अपने उदारशील मित्र के
सद्व्यवहार की प्रशंसा करते। बाबू साहब दिन-भर में इतने रंग बदलते थे कि उस पर ‘पेरिस’
की परियों को भी ईर्ष्या हो सकती थी। कई बैंकों में उनके हिस्से थे। कई दुकानें
थीं; किंतु बाबू साहब को
इतना अवकाश न था कि उनकी कुछ देखभाल करते। अतिथि-सत्कार एक पवित्र धर्म है। ये
सच्ची देशहितैषिता की उमंग से कहा करते थे—अतिथि-सत्कार आदिकाल
से भारतवर्ष के निवासियों का एक प्रधान और सराहनीय गुण है। अभ्यागतों का
आदर-सम्मान करनें में हम अद्वितीय हैं। हम इससे संसार में मनुष्य कहलाने योग्य
हैं। हम सब कुछ खो बैठे हैं, किन्तु जिस दिन हममें
यह गुण शेष न रहेगा; वह दिन हिंदू-जाति के
लिए लज्जा, अपमान और मृत्यु का
दिन होगा।
मिस्टर
रामरक्षा जातीय आवश्यकताओं से भी बेपरवाह न थे। वे सामाजिक और राजनीतिक कार्यो में
पूर्णरुपेण योग देते थे। यहॉँ तक कि प्रतिवर्ष दो, बल्कि
कभी-कभी तीन वक्तृताऍं अवश्य तैयार कर लेते। भाषणों की भाषा अत्यंत उपयुक्त, ओजस्वी और सर्वांग सुंदर होती थी।
उपस्थित जन और इष्टमित्र उनके एक-एक शब्द पर प्रशंसासूचक शब्दों की ध्वनि प्रकट
करते, तालियॉँ बजाते, यहॉँ तक कि बाबू साहब को व्याख्यान का
क्रम स्थिर रखना कठिन हो जाता। व्याख्यान समाप्त होने पर उनके मित्र उन्हें गोद
में उठा लेते और आश्चर्यचकित होकर कहते—तेरी भाषा में जादू
है! सारांश यह कि बाबू साहब के यह जातीय प्रेम और उद्योग केवल बनावटी, सहायता-शून्य तथ फैशनेबिल था। यदि
उन्होंने किसी सदुद्योग में भाग लिया था, तो वह सम्मिलित
कुटुम्ब का विरोध था। अपने पिता के पश्चात वे अपनी विधवा मॉँ से अलग हो गए थे। इस
जातीय सेवा में उनकी स्त्री विशेष सहायक थी। विधवा मॉँ अपने बेटे और बहू के साथ
नहीं रह सकती थी। इससे बहू की सवाधीनता में विघ्न पड़ने से मन दुर्बल और मस्तिष्क
शक्तिहीन हो जाता है। बहू को जलाना और कुढ़ाना सास की आदत है। इसलिए बाबू रामरक्षा
अपनी मॉँ से अलग हो गये थे। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने मातृ-ऋण का विचार करके
दस हजार रुपये अपनी मॉँ के नाम जमा कर दिये थे,
कि
उसके ब्याज से उनका निर्वाह होता रहे; किंतु बेटे के इस
उत्तम आचरण पर मॉँ का दिल ऐसा टूटा कि वह दिल्ली छोड़कर अयोध्या जा रहीं। तब से
वहीं रहती हैं। बाबू साहब कभी-कभी मिसेज रामरक्षा से छिपकर उससे मिलने अयोध्या
जाया करते थे, किंतु वह दिल्ली आने
का कभी नाम न लेतीं। हॉँ, यदि कुशल-क्षेम की
चिट्ठी पहुँचने में कुछ देर हो जाती, तो विवश होकर समाचार
पूछ देती थीं।
2
उ
|
सी मुहल्ले में एक सेठ गिरधारी लाल रहते
थे। उनका लाखों का लेन-देन था। वे हीरे और रत्नों का व्यापार करते थे। बाबू
रामरक्षा के दूर के नाते में साढ़ू होते थे। पुराने ढंग के आदमी थे—प्रात:काल यमुना-स्नान करनेवाले तथा गाय
को अपने हाथों से झाड़ने-पोंछनेवाले! उनसे मिस्टर रामरक्षा का स्वभाव न मिलता था; परन्तु जब कभी रुपयों की आवश्यकता होती, तो वे सेठ गिरधारी लाल के यहॉँ से
बेखटके मँगा लिया करते थे। आपस का मामला था,
केवल
चार अंगुल के पत्र पर रुपया मिल जाता था, न कोई दस्तावेज, न स्टाम्प, न साक्षियों की आवश्यकता। मोटरकार के
लिए दस हजार की आवश्यकता हुई, वह वहॉँ से आया।
घुड़दौड़ के लिए एक आस्ट्रेलियन घोड़ा डेढ़ हजार में लिया गया। उसके लिए भी रुपया
सेठ जी के यहॉँ से आया। धीरे-धीरे कोई बीस हजार का मामला हो गया। सेठ जी सरल हृदय
के आदमी थे। समझते थे कि उसके पास दुकानें हैं,
बैंकों
में रुपया है। जब जी चाहेगा, रुपया वसूल कर लेंगे; किन्तु जब दो-तीन वर्ष व्यतीत हो गये और
सेठ जी तकाजों की अपेक्षा मिस्टर रामरक्षा की मॉँग ही का अधिक्य रहा तो गिरधारी
लाल को सन्देह हुआ। वह एक दिन रामरक्षा के मकान पर आये और सभ्य-भाव से बोले—भाई साहब, मुझे
एक हुण्डी का रुपया देना है, यदि आप मेरा हिसाब कर
दें तो बहुत अच्छा हो। यह कह कर हिसाब के कागजात और उनके पत्र दिखलायें। मिस्टर
रामरक्षा किसी गार्डन-पार्टी में सम्मिलित होने के लिए तैयार थे। बोले—इस समय क्षमा कीजिए; फिर देख लूँगा, जल्दी क्या है?
गिरधारी
लाल को बाबू साहब की रुखाई पर क्रोध आ गया,
वे
रुष्ट होकर बोले—आपको जल्दी नहीं है, मुझे तो है! दो सौ रुपये मासिक की मेरी
हानि हो रही है! मिस्टर के असंतोष प्रकट करते हुए घड़ी देखी। पार्टी का समय बहुत
करीब था। वे बहुत विनीत भाव से बोले—भाई साहब, मैं बड़ी जल्दी में हूँ। इस समय मेरे
ऊपर कृपा कीजिए। मैं कल स्वयं उपस्थित हूँगा।
सेठ
जी एक माननीय और धन-सम्पन्न आदमी थे। वे रामरक्षा के कुरुचिपूर्ण व्यवहार पर जल
गए। मैं इनका महाजन हूँ—इनसे धन में, मान में, ऐश्वर्य
में, बढ़ा हुआ, चाहूँ तो ऐसों को नौकर रख लूँ, इनके दरवाजें पर आऊँ और आदर-सत्कार की
जगह उलटे ऐसा रुखा बर्ताव? वह हाथ बॉँधे मेरे
सामने न खड़ा रहे; किन्तु क्या मैं पान, इलायची, इत्र
आदि से भी सम्मान करने के योग्य नहीं? वे तिनक कर बोले—अच्छा, तो
कल हिसाब साफ हो जाय।
रामरक्षा
ने अकड़ कर उत्तर दिया—हो जायगा।
रामरक्षा
के गौरवशाल हृदय पर सेठ जी के इस बर्ताव के प्रभाव का कुछ खेद-जनक असर न हुआ। इस
काठ के कुन्दे ने आज मेरी प्रतिष्ठा धूल में मिला दी। वह मेरा अपमान कर गया। अच्छा, तुम भी इसी दिल्ली में रहते हो और हम
भी यही हैं। निदान दोनों में गॉँठ पड़ गयी। बाबू साहब की तबीयत ऐसी गिरी और हृदय
में ऐसी चिन्ता उत्पन्न हुई कि पार्टी में आने का ध्यान जाता रहा, वे देर तक इसी उलझन में पड़े रहे। फिर
सूट उतार दिया और सेवक से बोले—जा, मुनीम जी को बुला ला। मुनीम जी आये, उनका हिसाब देखा गया, फिर बैंकों का एकाउंट देखा; किन्तु ज्यों-ज्यों इस घाटी में उतरते
गये, त्यों-त्यों अँधेरा
बढ़ता गया। बहुत कुछ टटोला, कुछ हाथ न आया। अन्त
में निराश होकर वे आराम-कुर्सी पर पड़ गए और उन्होंने एक ठंडी सॉँस ले ली। दुकानों
का माल बिका; किन्तु रुपया बकाया
में पड़ा हुआ था। कई ग्राहकों की दुकानें टूट गयी। और उन पर जो नकद रुपया बकाया था, वह डूब गया। कलकत्ते के आढ़तियों से जो
माल मँगाया था, रुपये चुकाने की तिथि
सिर पर आ पहुँची और यहॉँ रुपया वसूल न हुआ। दुकानों का यह हाल, बैंकों का इससे भी बुरा। रात-भर वे
इन्हीं चिंताओं में करवटें बदलते रहे। अब क्या करना चाहिए? गिरधारी लाल सज्जन पुरुष हैं। यदि सारा
हाल उसे सुना दूँ, तो अवश्य मान जायगा, किन्तु यह कष्टप्रद कार्य होगा कैसे? ज्यों-ज्यों प्रात:काल समीप आता था, त्यों-त्यों उनका दिल बैठा जाता था।
कच्चे विद्यार्थी की जो दशा परीक्षा के सन्निकट आने पर होती है, यही हाल इस समय रामरक्षा का था। वे
पलंग से न उठे। मुँह-हाथ भी न धोया, खाने को कौन कहे।
इतना जानते थे कि दु:ख पड़ने पर कोई किसी का साथी नहीं होता। इसलिए एक आपत्ति से
बचने के लिए कई आपत्तियों का बोझा न उठाना पड़े, इस
खयाल से मित्रों को इन मामलों की खबर तक न दी। जब दोपहर हो गया और उनकी दशा ज्यों
की त्यों रही, तो उनका छोटा लड़का
बुलाने आया। उसने बाप का हाथ पकड़ कर कहा—लाला जी, आज दाने क्यों नहीं तलते?
रामरक्षा—भूख नहीं है।
‘क्या काया है?’
‘मन की मिठाई।’
‘और क्या काया है?’
‘मार।’
‘किसने मारा है?’
‘गिरधारीलाल ने।’
लड़का
रोता हुआ घर में गया और इस मार की चोट से देर तक रोता रहा। अन्त में तश्तरी में
रखी हुई दूध की मलाई ने उसकी चोट पर मरहम का काम किया।
3
रो
|
गी को जब जीने की आशा नहीं रहती, तो औषधि छोड़ देता है। मिस्टर रामरक्षा
जब इस गुत्थी को न सुलझा सके, तो चादर तान ली और
मुँह लपेट कर सो रहे। शाम को एकाएक उठ कर सेठ जी के यहॉँ पहुँचे और कुछ असावधानी
से बोले—महाशय, मैं आपका हिसाब नहीं कर सकता।
सेठ
जी घबरा कर बोले—क्यों?
रामरक्षा—इसलिए कि मैं इस समय दरिद्र-निहंग हूँ।
मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। आप का रुपया जैसे चाहें वसूल कर लें।
सेठ—यह आप कैसी बातें कहते हैं?
रामरक्षा—बहुत सच्ची।
सेठ—दुकानें नहीं हैं?
रामरक्षा—दुकानें आप मुफ्त लो जाइए।
सेठ—बैंक के हिस्से?
रामरक्षा—वह कब के उड़ गये।
सेठ—जब यह हाल था, तो आपको उचित नहीं था कि मेरे गले पर
छुरी फेरते?
रामरक्षा—(अभिमान) मैं आपके यहॉँ उपदेश सुनने के
लिए नहीं आया हूँ।
यह
कह कर मिस्टर रामरक्षा वहॉँ से चल दिए। सेठ जी ने तुरन्त नालिश कर दी। बीस हजार
मूल, पॉँच हजार ब्याज।
डिगरी हो गयी। मकान नीलाम पर चढ़ा। पन्द्रह हजार की जायदाद पॉँच हजार में निकल
गयी। दस हजार की मोटर चार हजार में बिकी।
सारी सम्पत्ति उड़ जाने पर कुल मिला कर सोलह हजार से अधिक रमक न खड़ी हो सकी। सारी
गृहस्थी नष्ट हो गयी, तब भी दस हजार के ऋणी
रह गये। मान-बड़ाई, धन-दौलत सभी मिट्टी
में मिल गये। बहुत तेज दौड़ने वाला मनुष्य प्राय: मुँह के बल गिर पड़ता है।
4
इ
|
स घटना के कुछ दिनों पश्चात् दिल्ली
म्युनिसिपैलिटी के मेम्बरों का चुनाव आरम्भ हुआ। इस पद के अभिलाषी वोटरों की सजाऍं
करने लगे। दलालों के भाग्य उदय हुए। सम्मतियॉँ मोतियों की तोल बिकने लगीं।
उम्मीदवार मेम्बरों के सहायक अपने-अपने मुवक्किल के गुण गान करने लगे। चारों ओर
चहल-पहल मच गयी। एक वकील महाशय ने भरी सभा में मुवक्किल साहब के विषय में कहा—
‘मैं जिस बुजरुग का पैरोकार हूँ, वह कोई मामूली आदमी नहीं है। यह वह शख्स
है, जिसने फरजंद अकबर की
शादी में पचीस हजार रुपया सिर्फ रक्स व सरुर में सर्फ कर दिया था।’
उपस्थित
जनों में प्रशंसा की उच्च ध्वनि हुई
एक
दूसरे महाशय ने अपने मुहल्ले के वोटरों के सम्मुख मुवक्किल की प्रशंसा यों की—
“मैं यह नहीं कह सकता
कि आप सेठ गिरधारीलाल को अपना मेम्बर बनाइए। आप अपना भला-बुरा स्वयं समझते हैं, और यह भी नहीं कि सेठ जी मेरे द्वारा
अपनी प्रशंसा के भूखें हों। मेरा निवेदन केवल यही है कि आप जिसे मेम्बर बनायें, पहले उसके गुण-दोषों का भली भॉँति परिचय
ले लें। दिल्ली में केवल एक मनुष्य है, जो गत वर्षो से आपकी
सेवा कर रहा है। केवल एक आदमी है, जिसने पानी पहुँचाने
और स्वच्छता-प्रबंधों में हार्दिक धर्म-भाव से सहायता दी है। केवल एक पुरुष है, जिसको श्रीमान वायसराय के दरबार में
कुर्सी पर बैठने का अधिकार प्राप्त है, और आप सब महाशय उसे
जानते भी हैं।”
उपस्थित
जनों ने तालियॉँ बजायीं।
सेठ
गिरधारीलाल के मुहल्ले में उनके एक प्रतिवादी थे। नाम था मुंशी फैजुलरहमान खॉँ।
बड़े जमींदार और प्रसिद्ध वकील थे। बाबू रामरक्षा ने अपनी दृढ़ता, साहस,
बुद्विमत्ता और मृदु भाषण से मुंशी जी साहब की सेवा करनी आरम्भ की। सेठ जी को परास्त करने का यह अपूर्व
अवसर हाथ आया। वे रात और दिन इसी धुन में लगे रहते। उनकी मीठी और रोचक बातों का
प्रभाव उपस्थित जनों पर बहुत अच्छा पड़ता। एक बार आपने असाधारण श्रद्धा-उमंग में आ
कर कहा—मैं डंके की चोट पर
कहता हूँ कि मुंशी फैजुल रहमान से अधिक योग्य आदमी आपको दिल्ली में न मिल सकेगा।
यह वह आदमी है, जिसकी गजलों पर
कविजनों में ‘वाह-वाह’ मच जाती है। ऐसे श्रेष्ठ आदमी की
सहायता करना मैं अपना जातीय और सामाजिक धर्म समझता हूँ। अत्यंत शोक का विषय है कि
बहुत-से लोग इस जातीय और पवित्र काम को व्यक्तिगत लाभ का साधन बनाते हैं; धन और वस्तु है, श्रीमान वायसराय के दरबार में
प्रतिष्ठित होना और वस्तु, किंतु सामाजिक सेवा
तथा जातीय चाकरी और ही चीज है। वह मनुष्य, जिसका जीवन
ब्याज-प्राप्ति, बेईमानी, कठोरता तथा निर्दयता और सुख-विलास में
व्यतीत होता हो, इस सेवा के योग्य
कदापि नहीं है।
5
से
|
ठ गिरधारीलाल इस अन्योक्तिपूर्ण भाषण का
हाल सुन कर क्रोध से आग हो गए। मैं बेईमान हूँ! ब्याज का धन खानेवाला हूँ! विषयी
हूँ! कुशल हुई, जो तुमने मेरा नाम
नहीं लिया; किंतु अब भी तुम मेरे
हाथ में हो। मैं अब भी तुम्हें जिस तरह चाहूँ,
नचा
सकता हूँ। खुशामदियों ने आग पर तेल डाला। इधर रामरक्षा अपने काम में तत्पर रहे।
यहॉँ तक कि ‘वोटिंग-डे’ आ पहुँचा। मिस्टर रामरक्षा को उद्योग
में बहुत कुछ सफलता प्राप्त हुई थी। आज वे बहुत प्रसन्न थे। आज गिरधारीलाल को नीचा
दिखाऊँगा, आज उसको जान पड़ेगा
कि धन संसार के सभी पदार्थो को इकट्ठा नहीं कर सकता। जिस समय फैजुलरहमान के वोट
अधिक निकलेंगे और मैं तालियॉँ बजाऊँगा, उस समय गिरधारीलाल का
चेहरा देखने योग्य होगा, मुँह का रंग बदल
जायगा, हवाइयॉँ उड़ने लगेगी, ऑंखें न मिला सकेगा। शायद, फिर मुझे मुँह न दिखा सके। इन्हीं
विचारों में मग्न रामरक्षा शाम को टाउनहाल में पहुँचे। उपस्थित जनों ने बड़ी उमंग
के साथ उनका स्वागत किया। थोड़ी देर के बाद ‘वोटिंग’ आरम्भ हुआ। मेम्बरी मिलने की आशा
रखनेवाले महानुभाव अपने-अपने भाग्य का अंतिम फल सुनने के लिए आतुर हो रहे थे। छह
बजे चेयरमैन ने फैसला सुनाया। सेठ जी की हार हो गयी। फैजुलरहमान ने मैदान मार
लिया। रामरक्षा ने हर्ष के आवेग में टोपी हवा में उछाल दी और स्वयं भी कई बार उछल पड़े। मुहल्लेवालों को अचम्भा हुआ।
चॉदनी चौक से सेठ जी को हटाना मेरु को स्थान से उखाड़ना था। सेठ जी के चेहरे से
रामरक्षा को जितनी आशाऍं थीं, वे सब पूरी हो गयीं।
उनका रंग फीका पड़ गया था। खेद और लज्जा की मूर्ति बने हुए थे। एक वकील साहब ने
उनसे सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा—सेठ जी, मुझे आपकी हार का बहुत बड़ा शोक है।
मैं जानता कि खुशी के बदले रंज होगा, तो कभी यहॉँ न आता।
मैं तो केवल आपके ख्याल से यहॉँ आया था। सेठ जी ने बहुत रोकना चाहा, परंतु ऑंखों में ऑंसू डबडबा ही गये। वे
नि:स्पृह बनाने का व्यर्थ प्रयत्न करके बोले—वकील साहब, मुझे इसकी कुछ चिंता नहीं, कौन रियासत निकल गयी? व्यर्थ उलझन, चिंता तथा झंझट रहती थी, चलो,
अच्छा
हुआ। गला छूटा। अपने काम में हरज होता था। सत्य कहता हूँ, मुझे तो हृदय से प्रसन्नता ही हुई। यह
काम तो बेकाम वालों के लिए है, घर न बैठे रहे, यही बेगार की। मेरी मूर्खता थी कि मैं
इतने दिनों तक ऑंखें बंद किये बैठा रहा। परंतु सेठ जी की मुखाकृति ने इन विचारों
का प्रमाण न दिया। मुखमंडल हृदय का दर्पण है,
इसका
निश्चय अलबत्ता हो गया।
किंतु
बाबू रामरक्षा बहुत देर तक इस आनन्द का मजा न लूटने पाये और न सेठ जी को बदला लेने
के लिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। सभा विसर्जित होते ही जब बाबू रामरक्षा
सफलता की उमंग में ऐंठतें, मोंछ पर ताव देते और
चारों ओर गर्व की दृष्टि डालते हुए बाहर आये,
तो
दीवानी की तीन सिपाहियों ने आगे बढ़ कर उन्हें गिरफ्तारी का वारंट दिखा दिया। अबकी
बाबू रामरक्षा के चेहरे का रंग उतर जाने की,
और
सेठ जी के इस मनोवांछित दृश्य से आनन्द उठाने की बारी थी। गिरधारीलाल ने आनन्द की
उमंग में तालियॉँ तो न बजायीं, परंतु मुस्करा कर
मुँह फेर लिया। रंग में भंग पड़ गया।
आज
इस विषय के उपलक्ष्य में मुंशी फैजुलरहमान ने पहले ही से एक बड़े समारोह के साथ
गार्डन पार्टी की तैयारियॉं की थीं। मिस्टर रामरक्षा इसके प्रबंधकर्त्ता थे। आज की
‘आफ्टर डिनर’ स्पीच उन्होंने बड़े परिश्रम से तैयार
की थी; किंतु इस वारंट ने
सारी कामनाओं का सत्यानाश कर दिया। यों तो बाबू साहब के मित्रों में ऐसा कोई भी न
था, जो दस हजार रुपये
जमानत दे देता; अदा कर देने का तो
जिक्र ही कया; किंतु कदाचित ऐसा
होता भी तो सेठ जी अपने को भाग्यहीन समझते। दस हजार रुपये और म्युनिस्पैलिटी की
प्रतिष्ठित मेम्बरी खोकर इन्हें इस समय यह हर्ष हुआ था।
मिस्टर
रामरक्षा के घर पर ज्योंही यह खबर पहुँची, कुहराम मच गया। उनकी
स्त्री पछाड़ खा कर पृथ्वी पर गिर पड़ी। जब कुछ होश में आयी तो रोने लगी। और रोने
से छुट्टी मिली तो उसने गिरधारीलाल को कोसना आरम्भ किया। देवी-देवता मनाने लगी।
उन्हें रिश्वतें देने पर तैयार हुई कि ये गिरधारीलाल को किसी प्रकार निगल जायँ। इस
बड़े भारी काम में वह गंगा और यमुना से सहायता मॉँग रही थी, प्लेग और विसूचिका की खुशामदें कर रही
थी कि ये दोनों मिल कर उस गिरधारीलाल को हड़प ले जायँ! किंतु गिरधारी का कोई दोष
नहीं। दोष तुम्हारा है। बहुत अच्छा हुआ! तुम इसी पूजा के देवता थे। क्या अब दावतें
न खिलाओगे? मैंने तुम्हें कितना
समझया, रोयी, रुठी, बिगड़ी; किन्तु तुमने एक न सुनी। गिरधारीलाल ने
बहुत अच्छा किया। तुम्हें शिक्षा तो मिल गयी;
किन्तु
तुम्हारा भी दोष नहीं। यह सब आग मैंने ही लगायी। मखमली स्लीपरों के बिना मेरे पॉँव
ही नहीं उठते थे। बिना जड़ाऊ कड़ों के मुझे नींद न आती थी। सेजगाड़ी मेरे ही लिए
मँगवायी थी। अंगरेजी पढ़ने के लिए मेम साहब को मैंने ही रखा। ये सब कॉँटे मैंने ही
बोये हैं।
मिसेज
रामरक्षा बहुत देर तक इन्हीं विचारों में डूबी रही। जब रात भर करवटें बदलने के बाद
वह सबेरे उठी, तो उसके विचार चारों
ओर से ठोकर खा कर केवल एक केन्द्र पर जम गये। गिरधारीलाल बड़ा बदमाश और घमंडी है।
मेरा सब कुछ ले कर भी उसे संतोष नहीं हुआ। इतना भी इस निर्दयी कसाई से न देखा गया।
भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों ने मिल कर एक रुप धारण किया और क्रोधाग्नि को दहला
कर प्रबल कर दिया। ज्वालामुखी शीशे में जब सूर्य की किरणें एक होती हैं, तब अग्नि प्रकट हो जाती हैं। स्त्री के
हृदय में रह-रह कर क्रोध की एक असाधारण लहर उत्पन्न होती थी। बच्चे ने मिठाई के
लिए हठ किया; उस पर बरस पड़ीं; महरी ने चौका-बरतन करके चूल्हें में आग
जला दी, उसके पीछे पड़ गयी—मैं तो अपने दु:खों को रो रही हूँ, इस चुड़ैल को रोटियों की धुन सवार है।
निदान नौ बजे उससे न रहा गया। उसने यह पत्र लिख कर अपने हृदय की ज्वाला ठंडी की—
‘सेठ जी, तुम्हें
अब अपने धन के घमंड ने अंधा कर दिया है, किन्तु किसी का घमंड
इसी तरह सदा नहीं रह सकता। कभी न कभी सिर अवश्य नीचा होता है। अफसोस कि कल शाम को, जब तुमने मेरे प्यारे पति को पकड़वाया
है, मैं वहॉँ मौजूद न थी; नहीं तो अपना और तुम्हारा रक्त एक कर
देती। तुम धन के मद में भूले हुए हो। मैं उसी दम तुम्हारा नशा उतार देती! एक
स्त्री के हाथों अपमानित हो कर तुम फिर किसी को मुँह दिखाने लायक न रहते। अच्छा, इसका बदला तुम्हें किसी न किसी तरह जरुर मिल जायगा। मेरा
कलेजा उस दिन ठंडा होगा, जब तुम निर्वंश हो
जाओगे और तुम्हारे कुल का नाम मिट जायगा।
सेठ
जी पर यह फटकार पड़ी तो वे क्रोध से आग हो गये। यद्यपि क्षुद्र हृदय मनुष्य न थे, परंतु क्रोध के आवेग में सौजन्य का
चिह्न भी शेष नहीं रहता। यह ध्यान न रहा कि यह एक दु:खिनी की क्रंदन-ध्वनि है, एक सतायी हुई स्त्री की मानसिक दुर्बलता
का विचार है। उसकी धन-हीनता और विवशता पर उन्हें तनिक भी दया न आयी। मरे हुए को
मारने का उपाय सोचने लगे।
6
इ
|
सके तीसरे दिन सेठ गिरधारीलाल पूजा के
आसन पर बैठे हुए थे, महरा ने आकर कहा—सरकार, कोई
स्त्री आप से मिलने आयी है। सेठ जी ने पूछा—कौन स्त्री है? महरा ने कहा—सरकार, मुझे
क्या मालूम? लेकिन है कोई
भलेमानुस! रेशमी साड़ी पहने हुए हाथ में सोने के कड़े हैं। पैरों में टाट के
स्लीपर हैं। बड़े घर की स्त्री जान पड़ती हैं।
यों
साधारणत: सेठ जी पूजा के समय किसी से नहीं मिलते थे। चाहे कैसा ही आवश्यक काम
क्यों न हो, ईश्वरोपासना में
सामाजिक बाधाओं को घुसने नहीं देते थे। किन्तु ऐसी दशा में जब कि किसी बड़े घर की
स्त्री मिलने के लिए आये, तो थोड़ी देर के लिए
पूजा में विलम्ब करना निंदनीय नहीं कहा जा सकता, ऐसा
विचार करके वे नौकर से बोले—उन्हें बुला लाओं
जब
वह स्त्री आयी तो सेठ जी स्वागत के लिए उठ कर खड़े हो गये। तत्पश्चात अत्यंत कोमल
वचनों के कारुणिक शब्दों से बोले—माता, कहॉँ से आना हुआ? और जब यह उत्तर मिला कि वह अयोध्या से
आयी है, तो आपने उसे फिर से
दंडवत किया और चीनी तथा मिश्री से भी अधिक मधुर और नवनीत से भी अधिक चिकने शब्दों
में कहा—अच्छा, आप श्री अयोध्या जी से आ रही हैं? उस नगरी का क्या कहना! देवताओं की पुरी
हैं। बड़े भाग्य थे कि आपके दर्शन हुए। यहॉँ आपका आगमन कैसे हुआ? स्त्री ने उत्तर दिया—घर तो मेरा यहीं है। सेठ जी का मुख पुन:
मधुरता का चित्र बना। वे बोले—अच्छा, तो मकान आपका इसी शहर में है? तो आपने माया-जंजाल को त्याग दिया? यह तो मैं पहले ही समझ गया था। ऐसी
पवित्र आत्माऍं संसार में बहुत थोड़ी हैं। ऐसी देवियों के दर्शन दुर्लभ होते हैं। आपने मुझे दर्शन दिया, बड़ी कृपा की। मैं इस योग्य नहीं, जो आप-जैसी विदुषियों की कुछ सेवा कर
सकूँ? किंतु जो काम मेरे
योग्य हो—जो कुछ मेरे किए हो
सकता हो—उसे करने के लिए मैं
सब भॉँति से तैयार हूँ। यहॉँ सेठ-साहूकारों ने मुझे बहुत बदनाम कर रखा है, मैं सबकी ऑंखों में खटकता हूँ। उसका
कारण सिवा इसके और कुछ नहीं कि जहॉँ वे लोग लाभ का ध्यान रखते हैं, वहॉँ मैं भलाई पर रखता हूँ। यदि कोई
बड़ी अवस्था का वृद्ध मनुष्य मुझसे कुछ कहने-सुनने के लिए आता है, तो विश्वास मानों, मुझसे उसका वचन टाला नहीं जाता। कुछ
बुढ़ापे का विचार; कुछ उसके दिल टूट
जाने का डर; कुछ यह ख्याल कि कहीं
यह विश्वासघातियों के फंदे में न फंस जाय, मुझे उसकी इच्छाओं की
पूर्ति के लिए विवश कर देता है। मेरा यह सिद्धान्त है कि अच्छी जायदाद और कम
ब्याज। किंतु इस प्रकार बातें आपके सामने करना व्यर्थ है। आप से तो घर का मामला
है। मेरे योग्य जो कुछ काम हो, उसके लिए मैं सिर
ऑंखों से तैयार हूँ।
वृद्ध
स्त्री—मेरा काम आप ही से हो
सकता है।
सेठ
जी—(प्रसन्न हो कर) बहुत
अच्छा; आज्ञा दो।
स्त्री—मैं आपके सामने भिखारिन बन कर आयी हूँ।
आपको छोड़कर कोई मेरा सवाल पूरा नहीं कर सकता।
सेठ
जी—कहिए, कहिए।
स्त्री—आप रामरक्षा को छोड़ दीजिए।
सेठ
जी के मुख का रंग उतर गया। सारे हवाई किले जो अभी-अभी तैयार हुए थे, गिर पड़े। वे बोले—उसने मेरी बहुत हानि की है। उसका घमंड
तोड़ डालूँगा, तब छोड़ूँगा।
स्त्री—तो क्या कुछ मेरे बुढ़ापे का, मेरे हाथ फैलाने का, कुछ अपनी बड़ाई का विचार न करोगे? बेटा, ममता
बुरी होती है। संसार से नाता टूट जाय; धन जाय; धर्म जाय,
किंतु लड़के का स्नेह हृदय से नहीं जाता। संतोष सब कुछ कर सकता है। किंतु बेटे का
प्रेम मॉँ के हृदय से नहीं निकल सकता। इस पर हाकिम का, राजा का, यहॉँ
तक कि ईश्वर का भी बस नहीं है। तुम मुझ पर तरस खाओ। मेरे लड़के की जान छोड़ दो, तुम्हें बड़ा यश मिलेगा। मैं जब तक
जीऊँगी, तुम्हें आशीर्वाद
देती रहूँगी।
सेठ
जी का हृदय कुछ पसीजा। पत्थर की तह में पानी रहता है; किंतु तत्काल ही उन्हें मिसेस रामरक्षा
के पत्र का ध्यान आ गया। वे बोले—मुझे रामरक्षा से कोई
उतनी शत्रुता नहीं थी, यदि उन्होंने मुझे न
छेड़ा होता, तो मैं न बोलता। आपके कहने से मैं अब भी उनका अपराध क्षमा
कर सकता हूँ! परन्तु उसकी बीबी साहबा ने जो पत्र मेरे पास भेजा है, उसे देखकर शरीर में आग लग जाती है।
दिखाउँ आपको! रामरक्षा की मॉँ ने पत्र ले कर पढ़ा तो उनकी ऑंखों में ऑंसू भर आये।
वे बोलीं—बेटा, उस स्त्री ने मुझे बहुत दु:ख दिया है।
उसने मुझे देश से निकाल दिया। उसका मिजाज और जबान उसके वश में नहीं; किंतु इस समय उसने जो गर्व दिखाया है; उसका तुम्हें ख्याल नहीं करना चाहिए।
तुम इसे भुला दो। तुम्हारा देश-देश में नाम है। यह नेकी तुम्हारे नाक को और भी
फैला देगी। मैं तुमसे प्रण करती हूँ कि सारा समाचार रामरक्षा से लिखवा कर किसी
अच्छे समाचार-पत्र में छपवा दूँगी। रामरक्षा मेरा कहना नहीं टालेगा। तुम्हारे इस
उपकार को वह कभी न भूलेगा। जिस समय ये समाचार संवादपत्रों में छपेंगे, उस समय हजारों मनुष्यों को तुम्हारे
दर्शन की अभिलाषा होगी। सरकार में तुम्हारी बड़ाई होगी और मैं सच्चे हृदय से कहती
हूँ कि शीघ्र ही तुम्हें कोई न कोई पदवी मिल जायगी। रामरक्षा की अँगरेजों से बहुत
मित्रता है, वे उसकी बात कभी न
टालेंगे।
सेठ
जी के हृदय में गुदगुदी पैदा हो गयी। यदि इस व्यवहार में वह पवित्र और माननीय
स्थान प्राप्त हो जाय—जिसके लिए हजारों खर्च
किये, हजारों डालियॉँ दीं, हजारों अनुनय-विनय कीं, हजारों खुशामदें कीं, खानसामों की झिड़कियॉँ सहीं, बँगलों के चक्कर लगाये—तो इस सफलता के लिए ऐसे कई हजार मैं
खर्च कर सकता हूँ। नि:संदेह मुझे इस काम में रामरक्षा से बहुत कुछ सहायता मिल सकती
है; किंतु इन विचारों को
प्रकट करने से क्या लाभ? उन्होंने कहा—माता, मुझे
नाम-नमूद की बहुत चाह नहीं हैं। बड़ों ने कहा है—नेकी
कर दरियां में डाल। मुझे तो आपकी बात का ख्याल है। पदवी मिले तो लेने से इनकार
नहीं; न मिले तो तृष्णा
नहीं, परंतु यह तो बताइए कि
मेरे रुपयों का क्या प्रबंध होगा? आपको मालूम होगा कि
मेरे दस हजार रुपये आते हैं।
रामरक्षा
की मॉँ ने कहा—तुम्हारे रुपये की
जमानत में करती हूँ। यह देखों, बंगाल-बैंक की पास
बुक है। उसमें मेरा दस हजार रुपया जमा है। उस रुपये से तुम रामरक्षा को कोई
व्यवसाय करा दो। तुम उस दुकान के मालिक रहोगे,
रामरक्षा
को उसका मैनेजर बना देना। जब तक तुम्हारे कहे पर चले, निभाना; नहीं
तो दूकान तुम्हारी है। मुझे उसमें से कुछ नहीं चाहिए। मेरी खोज-खबर लेनेवाला ईश्वर
है। रामरक्षा अच्छी तरह रहे, इससे अधिक मुझे और न
चाहिए। यह कहकर पास-बुक सेठ जी को दे दी। मॉँ के इस अथाह प्रेम ने सेठ जी को
विह्वल कर दिया। पानी उबल पड़ा, और पत्थर के नीचे ढँक
गया। ऐसे पवित्र दृश्य देखने के लिए जीवन में कम अवसर मिलते हैं। सेठ जी के हृदय में
परोपकार की एक लहर-सी उठी; उनकी ऑंखें डबडबा
आयीं। जिस प्रकार पानी के बहाव से कभी-कभी बॉँध टूट जाता है; उसी प्रकार परोपकार की इस उमंग ने
स्वार्थ और माया के बॉँध को तोड़ दिया। वे पास-बुक वृद्ध स्त्री को वापस देकर बोले—माता, यह
अपनी किताब लो। मुझे अब अधिक लज्जित न करो। यह देखो, रामरक्षा
का नाम बही से उड़ा देता हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने
अपना सब कुछ पा लिया। आज तुम्हारा रामरक्षा तुम को मिल जायगा।
इस
घटना के दो वर्ष उपरांत टाउनहाल में फिर एक बड़ा जलसा हुआ। बैंड बज रहा था, झंडियॉँ और ध्वजाऍं वायु-मंडल में लहरा
रही थीं। नगर के सभी माननीय पुरुष उपस्थित थे। लैंडो, फिटन और मोटरों से सारा हाता भरा हुआ
था। एकाएक मुश्ती घोड़ों की एक फिटन ने हाते में प्रवेश किया। सेठ गिरधारीलाल
बहुमूल्य वस्त्रों से सजे हुए उसमें से उतरे। उनके साथ एक फैशनेबुल नवयुवक
अंग्रेजी सूट पहने मुस्कराता हुआ उतरा। ये मिस्टर रामरक्षा थे। वे अब सेठ जी की एक
खास दुकान का मैनेजर हैं। केवल मैनेजर ही नहीं,
किंतु
उन्हें मैंनेजिंग प्रोप्राइटर समझना चाहिए। दिल्ली-दरबार में सेठ जी को राबहादुर
का पद मिला है। आज डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट नियमानुसार इसकी घोषणा करेंगे और सूचित
करेंगे कि नगर के माननीय पुरुषों की ओर से सेठ जी को धन्यवाद देने के लिए बैठक हुई
है। सेठ जी की ओर से धन्यवाद का वक्तव्य रामरक्षा करेंगे। जिल लोगों ने उनकी
वक्तृताऍं सुनी हैं, वे बहुत उत्सुकता से
उस अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
बैठक
समाप्त होने पर सेठ जी रामरक्षा के साथ अपने भवन पर पहुँचे, तो मालूम हुआ कि आज वही वृद्धा उनसे फिर
मिलने आयी है। सेठ जी दौड़कर रामरक्षा की मॉँ के चरणों से लिपट गये। उनका हृदय इस
समय नदी की भॉँति उमड़ा हुआ था।
‘रामरक्षा ऐंड फ्रेडस’ नामक चीनी बनाने का कारखाना बहुत
उन्नति पर हैं। रामरक्षा अब भी उसी ठाट-बाट से जीवन व्यतीत कर रहे हैं; किंतु पार्टियॉँ कम देते हैं और दिन-भर
में तीन से अधिक सूट नहीं बदलते। वे अब उस पत्र को, जो
उनकी स्त्री ने सेठ जी को लिखा था, संसार की एक बहुत
अमूल्य वस्तु समझते हैं और मिसेज रामरक्षा को भी अब सेठ जी के नाम को मिटाने की
अधिक चाह नहीं है। क्योंकि अभी हाल में जब लड़का पैदा हुआ था, मिसेज रामरक्षा ने अपना सुवर्ण-कंकण धाय
को उपहार दिया था मनों मिठाई बॉँटी थी।
यह
सब हो गया; किंतु वह बात, जो अब होनी चाहिए थी, न हुई। रामरक्षा की मॉँ अब भी अयोध्या
में रहती हैं और अपनी पुत्रवधू की सूरत नहीं देखना चाहतीं।
मंत्र
सं
|
ध्या का समय था। डाक्टर चड्ढा गोल्फ
खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली
लिये आते दिखायी दिये। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था। डोली औषाधालय
के सामने आकर रूक गयी। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक से झॉँका।
ऐसी साफ-सुथरी जमीन पर पैर रखते हुए भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे। डाक्टर
साहब को खड़े देख कर भी उसे कुछ कहने का साहस न हुआ।
डाक्टर
साहब ने चिक के अंदर से गरज कर कहा—कौन है? क्या चाहता है?
डाक्टर
साहब ने हाथ जोड़कर कहा— हुजूर बड़ा गरीब आदमी
हूँ। मेरा लड़का कई दिन से.......
डाक्टर
साहब ने सिगार जला कर कहा—कल सबेरे आओ, कल सबेरे, हम
इस वक्त मरीजों को नहीं देखते।
बूढ़े
ने घुटने टेक कर जमीन पर सिर रख दिया और बोला—दुहाई है सरकार की, लड़का मर जायगा! हुजूर, चार दिन से ऑंखें नहीं.......
डाक्टर
चड्ढा ने कलाई पर नजर डाली। केवल दस मिनट समय और बाकी था। गोल्फ-स्टिक खूँटी से
उतारने हुए बोले—कल सबेरे आओ, कल सबेरे;
यह हमारे खेलने का समय है।
बूढ़े
ने पगड़ी उतार कर चौखट पर रख दी और रो कर बोला—हूजुर, एक निगाह देख लें। बस, एक निगाह! लड़का हाथ से चला जायगा हुजूर, सात लड़कों में यही एक बच रहा है, हुजूर। हम दोनों आदमी रो-रोकर मर
जायेंगे, सरकार! आपकी बढ़ती
होय, दीनबंधु!
ऐसे
उजड़ड देहाती यहॉँ प्राय: रोज आया करते थे। डाक्टर साहब उनके स्वभाव से खूब परिचित
थे। कोई कितना ही कुछ कहे; पर वे अपनी ही रट
लगाते जायँगे। किसी की सुनेंगे नहीं। धीरे से चिक उठाई और बाहर निकल कर मोटर की
तरफ चले। बूढ़ा यह कहता हुआ उनके पीछे दौड़ा—सरकार, बड़ा धरम होगा। हुजूर, दया कीजिए, बड़ा दीन-दुखी हूँ; संसार में कोई और नहीं है, बाबू जी!
मगर
डाक्टर साहब ने उसकी ओर मुँह फेर कर देखा तक नहीं। मोटर पर बैठ कर बोले—कल सबेरे आना।
मोटर
चली गयी। बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भॉँति निश्चल खड़ा रहा। संसार में ऐसे मनुष्य
भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद
के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते,
शायद
इसका उसे अब भी विश्वास न आता था। सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ
था। वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को
बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को
शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। जब तक बूढ़े को मोटर दिखायी दी, वह खड़ा टकटकी लागाये उस ओर ताकता रहा।
शायद उसे अब भी डाक्टर साहब के लौट आने की आशा थी। फिर उसने कहारों से डोली उठाने
को कहा। डोली जिधर से आयी थी, उधर ही चली गयी।
चारों ओर से निराश हो कर वह डाक्टर चड्ढा के पास आया था। इनकी बड़ी तारीफ सुनी थी।
यहॉँ से निराश हो कर फिर वह किसी दूसरे डाक्टर के पास न गया। किस्मत ठोक ली!
उसी
रात उसका हँसता-खेलता सात साल का बालक अपनी बाल-लीला समाप्त करके इस संसार से
सिधार गया। बूढ़े मॉँ-बाप के जीवन का यही एक आधार था। इसी का मुँह देख कर जीते थे।
इस दीपक के बुझते ही जीवन की अँधेरी रात भॉँय-भॉँय करने लगी। बुढ़ापे की विशाल
ममता टूटे हुए हृदय से निकल कर अंधकार आर्त्त-स्वर से रोने लगी।
2
क
|
ई साल गुजर गये। डाक्टर चड़ढा ने खूब यश
और धन कमाया; लेकिन इसके साथ ही
अपने स्वास्थ्य की रक्षा भी की, जो एक साधारण बात थी।
यह उनके नियमित जीवन का
आर्शीवाद था कि पचास वर्ष की अवस्था में उनकी चुस्ती और फुर्ती युवकों को भी
लज्जित करती थी। उनके हरएक काम का समय नियत था,
इस
नियम से वह जौ-भर भी न टलते थे। बहुधा लोग स्वास्थ्य के नियमों का पालन उस समय
करते हैं, जब रोगी हो जाते हें।
डाक्टर चड्ढा उपचार और संयम का रहस्य खूब समझते थे। उनकी संतान-संध्या भी इसी नियम
के अधीन थी। उनके केवल दो बच्चे हुए, एक लड़का और एक
लड़की। तीसरी संतान न हुई, इसीलिए श्रीमती चड्ढा
भी अभी जवान मालूम होती थीं। लड़की का तो विवाह हो चुका था। लड़का कालेज में पढ़ता
था। वही माता-पिता के जीवन का आधार था। शील और विनय का पुतला, बड़ा ही रसिक, बड़ा ही उदार, विद्यालय का गौरव, युवक-समाज की शोभा। मुखमंडल से तेज की
छटा-सी निकलती थी। आज उसकी बीसवीं सालगिरह थी।
संध्या का समय था। हरी-हरी घास पर
कुर्सियॉँ बिछी हुई थी। शहर के रईस और हुक्काम एक तरफ, कालेज के छात्र दूसरी तरफ बैठे भोजन कर
रहे थे। बिजली के प्रकाश से सारा मैदान जगमगा रहा था। आमोद-प्रमोद का सामान भी जमा
था। छोटा-सा प्रहसन खेलने की तैयारी थी। प्रहसन स्वयं कैलाशनाथ ने लिखा था। वही
मुख्य एक्टर भी था। इस समय वह एक रेशमी कमीज पहने, नंगे
सिर, नंगे पॉँव, इधर से उधर मित्रों की आव भगत में लगा हुआ था। कोई पुकारता—कैलाश, जरा
इधर आना; कोई उधर से बुलाता—कैलाश, क्या
उधर ही रहोगे? सभी उसे छोड़ते थे, चुहलें करते थे, बेचारे को जरा दम मारने का अवकाश न
मिलता था। सहसा एक रमणी ने उसके पास आकर पूछा—क्यों कैलाश, तुम्हारे सॉँप कहॉँ हैं? जरा मुझे दिखा दो।
कैलाश
ने उससे हाथ मिला कर कहा—मृणालिनी, इस वक्त क्षमा करो, कल दिखा दूगॉँ।
मृणालिनी
ने आग्रह किया—जी नहीं, तुम्हें दिखाना पड़ेगा, मै आज नहीं मानने की। तुम रोज ‘कल-कल’
करते हो।
मृणालिनी
और कैलाश दोनों सहपाठी थे ओर एक-दूसरे के प्रेम में पगे हुए। कैलाश को सॉँपों के
पालने, खेलाने और नचाने का
शौक था। तरह-तरह के सॉँप पाल रखे थे। उनके स्वभाव और चरित्र की परीक्षा करता रहता
था। थोड़े दिन हुए, उसने विद्यालय में ‘सॉँपों’
पर एक मार्के का व्याख्यान दिया था। सॉँपों को नचा कर दिखाया भी था! प्राणिशास्त्र
के बड़े-बड़े पंडित भी यह व्याख्यान सुन कर दंग रह गये थे! यह विद्या उसने एक बड़े
सँपेरे से सीखी थी। साँपों की जड़ी-बूटियॉँ जमा करने का उसे मरज था। इतना पता भर मिल
जाय कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छी जड़ी है,
फिर
उसे चैन न आता था। उसे लेकर ही छोड़ता था। यही व्यसन था। इस पर हजारों रूपये फूँक
चुका था। मृणालिनी कई बार आ चुकी थी; पर कभी सॉँपों को
देखने के लिए इतनी उत्सुक न हुई थी। कह नहीं सकते, आज
उसकी उत्सुकता सचमुच जाग गयी थी, या वह कैलाश पर उपने
अधिकार का प्रदर्शन करना चाहती थी; पर उसका आग्रह बेमौका
था। उस कोठरी में कितनी भीड़ लग जायगी, भीड़ को देख कर सॉँप
कितने चौकेंगें और रात के समय उन्हें छेड़ा जाना कितना बुरा लगेगा, इन बातों का उसे जरा भी ध्यान न आया।
कैलाश
ने कहा—नहीं, कल जरूर दिखा दूँगा। इस वक्त अच्छी तरह
दिखा भी तो न सकूँगा, कमरे में तिल रखने को
भी जगह न मिलेगी।
एक
महाशय ने छेड़ कर कहा—दिखा क्यों नहीं देते, जरा-सी बात के लिए इतना टाल-मटोल कर रहे
हो? मिस गोविंद, हर्गिज न मानना। देखें कैसे नहीं
दिखाते!
दूसरे
महाशय ने और रद्दा चढ़ाया—मिस गोविंद इतनी सीधी
और भोली हैं, तभी आप इतना मिजाज
करते हैं; दूसरे सुंदरी होती, तो इसी बात पर बिगड़ खड़ी होती।
तीसरे
साहब ने मजाक उड़ाया—अजी बोलना छोड़ देती।
भला, कोई बात है! इस पर
आपका दावा है कि मृणालिनी के लिए जान हाजिर है।
मृणालिनी
ने देखा कि ये शोहदे उसे रंग पर चढ़ा रहे हैं,
तो
बोली—आप लोग मेरी वकालत न
करें, मैं खुद अपनी वकालत
कर लूँगी। मैं इस वक्त सॉँपों का तमाशा नहीं देखना चाहती। चलो, छुट्टी हुई।
इस पर मित्रों ने ठट्टा लगाया। एक साहब
बोले—देखना तो आप सब कुछ
चाहें, पर दिखाये भी तो?
कैलाश
को मृणालिनी की झेंपी हुई सूरत को देखकर मालूम हुआ कि इस वक्त उनका इनकार वास्तव
में उसे बुरा लगा है। ज्योंही प्रीति-भोज समाप्त हुआ और गाना शुरू हुआ, उसने मृणालिनी और अन्य मित्रों को
सॉँपों के दरबे के सामने ले जाकर महुअर बजाना शुरू किया। फिर एक-एक खाना खोलकर
एक-एक सॉँप को निकालने लगा। वाह! क्या कमाल था! ऐसा जान पड़ता था कि वे कीड़े उसकी
एक-एक बात, उसके मन का एक-एक भाव
समझते हैं। किसी को उठा लिया, किसी को गरदन में
डाल लिया, किसी को हाथ में लपेट
लिया। मृणालिनी बार-बार मना करती कि इन्हें गर्दन में न डालों, दूर ही से दिखा दो। बस, जरा नचा दो। कैलाश की गरदन में सॉँपों को लिपटते देख
कर उसकी जान निकली जाती थी। पछता रही थी कि मैंने व्यर्थ ही इनसे सॉँप दिखाने को
कहा; मगर कैलाश एक न सुनता
था। प्रेमिका के सम्मुख अपने सर्प-कला-प्रदर्शन का ऐसा अवसर पाकर वह कब चूकता! एक
मित्र ने टीका की—दॉँत तोड़ डाले
होंगे।
कैलाश
हँसकर बोला—दॉँत तोड़ डालना
मदारियों का काम है। किसी के दॉँत नहीं तोड़ गये। कहिए तो दिखा दूँ? कह कर उसने एक काले सॉँप को पकड़ लिया
और बोला—‘मेरे पास इससे बड़ा
और जहरीला सॉँप दूसरा नहीं है, अगर किसी को काट ले, तो आदमी आनन-फानन में मर जाय। लहर भी न
आये। इसके काटे पर मन्त्र नहीं। इसके दॉँत दिखा दूँ?’
मृणालिनी
ने उसका हाथ पकड़कर कहा—नहीं-नहीं, कैलाश, ईश्वर
के लिए इसे छोड़ दो। तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ।
इस
पर एक-दूसरे मित्र बोले—मुझे तो विश्वास नहीं
आता, लेकिन तुम कहते हो, तो मान लूँगा।
कैलाश
ने सॉँप की गरदन पकड़कर कहा—नहीं साहब, आप ऑंखों से देख कर मानिए। दॉँत तोड़कर
वश में किया, तो क्या। सॉँप बड़ा
समझदार होता हैं! अगर उसे विश्वास हो जाय कि इस आदमी से मुझे कोई हानि न पहुँचेगी, तो वह उसे हर्गिज न काटेगा।
मृणालिनी
ने जब देखा कि कैलाश पर इस वक्त भूत सवार है,
तो
उसने यह तमाशा न करने के विचार से कहा—अच्छा भाई, अब यहॉँ से चलो। देखा, गाना शुरू हो गया है। आज मैं भी कोई चीज
सुनाऊँगी। यह कहते हुए उसने कैलाश का कंधा पकड़ कर चलने का इशारा किया और कमरे से
निकल गयी; मगर कैलाश विरोधियों
का शंका-समाधान करके ही दम लेना चाहता था। उसने सॉँप की गरदन पकड़ कर जोर से दबायी, इतनी जोर से इबायी कि उसका मुँह लाल हो
गया, देह की सारी नसें तन
गयीं। सॉँप ने अब तक उसके हाथों ऐसा व्यवहार न देखा था। उसकी समझ में न आता था कि
यह मुझसे क्या चाहते हें। उसे शायद भ्रम हुआ कि मुझे मार डालना चाहते हैं, अतएव वह आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया।
कैलाश
ने उसकी गर्दन खूब दबा कर मुँह खोल दिया और उसके जहरीले दॉँत दिखाते हुए बोला—जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें। आया विश्वास या अब भी कुछ
शक है? मित्रों ने आकर उसके
दॉँत देखें और चकित हो गये। प्रत्यक्ष प्रमाण के सामने सन्देह को स्थान कहॉँ।
मित्रों का शंका-निवारण करके कैलाश ने सॉँप की गर्दन ढीली कर दी और उसे जमीन पर
रखना चाहा, पर वह काला गेहूँवन क्रोध से पागल हो रहा था।
गर्दन नरम पड़ते ही उसने सिर उठा कर कैलाश की उँगली में जोर से काटा और वहॉँ से
भागा। कैलाश की ऊँगली से टप-टप खून टपकने लगा। उसने जोर से उँगली दबा ली और उपने
कमरे की तरफ दौड़ा। वहॉँ मेज की दराज में एक जड़ी रखी हुई थी, जिसे पीस कर लगा देने से घतक विष भी रफू
हो जाता था। मित्रों में हलचल पड़ गई। बाहर महफिल में भी खबर हुई। डाक्टर साहब
घबरा कर दौड़े। फौरन उँगली की जड़ कस कर बॉँधी गयी और जड़ी पीसने के लिए दी गयी।
डाक्टर साहब जड़ी के कायल न थे। वह उँगली का डसा भाग नश्तर से काट देना चाहते, मगर कैलाश को जड़ी पर पूर्ण विश्वास
था। मृणालिनी प्यानों पर बैठी हुई थी। यह खबर सुनते ही दौड़ी, और कैलाश की उँगली से टपकते हुए खून को
रूमाल से पोंछने लगी। जड़ी पीसी जाने लगी; पर उसी एक मिनट में
कैलाश की ऑंखें झपकने लगीं, ओठों पर पीलापन
दौड़ने लगा। यहॉँ तक कि वह खड़ा न रह सका। फर्श पर बैठ गया। सारे मेहमान कमरे में
जमा हो गए। कोई कुछ कहता था। कोई कुछ। इतने में जड़ी पीसकर आ गयी। मृणालिनी ने
उँगली पर लेप किया। एक मिनट और बीता। कैलाश की ऑंखें बन्द हो गयीं। वह लेट गया और
हाथ से पंखा झलने का इशारा किया। मॉँ ने दौड़कर उसका सिर गोद में रख लिया और बिजली
का टेबुल-फैन लगा दिया।
डाक्टर
साहब ने झुक कर पूछा कैलाश, कैसी तबीयत है? कैलाश ने धीरे से हाथ उठा लिए; पर कुछ बोल न सका। मृणालिनी ने करूण
स्वर में कहा—क्या जड़ी कुछ असर न
करेंगी? डाक्टर साहब ने सिर
पकड़ कर कहा—क्या बतलाऊँ, मैं इसकी बातों में आ गया। अब तो नश्तर
से भी कुछ फायदा न होगा।
आध
घंटे तक यही हाल रहा। कैलाश की दशा प्रतिक्षण बिगड़ती जाती थी। यहॉँ तक कि उसकी
ऑंखें पथरा गयी, हाथ-पॉँव ठंडे पड़
गये, मुख की कांति मलिन
पड़ गयी, नाड़ी का कहीं पता
नहीं। मौत के सारे लक्षण दिखायी देने लगे। घर में कुहराम मच गया। मृणालिनी एक ओर
सिर पीटने लगी; मॉँ अलग पछाड़े खाने
लगी। डाक्टर चड्ढा को मित्रों ने पकड़ लिया, नहीं तो वह नश्तर
अपनी गर्दन पर मार लेते।
एक
महाशय बोले—कोई मंत्र झाड़ने
वाला मिले, तो सम्भव है, अब भी जान बच जाय।
एक
मुसलमान सज्जन ने इसका समर्थन किया—अरे साहब कब्र में
पड़ी हुई लाशें जिन्दा हो गयी हैं। ऐसे-ऐसे बाकमाल पड़े हुए हैं।
डाक्टर चड्ढा बोले—मेरी अक्ल पर पत्थर पड़ गया था कि इसकी
बातों में आ गया। नश्तर लगा देता, तो यह नौबत ही क्यों
आती। बार-बार समझाता रहा कि बेटा, सॉँप न पालो, मगर कौन सुनता था! बुलाइए, किसी झाड़-फूँक करने वाले ही को बुलाइए।
मेरा सब कुछ ले ले, मैं अपनी सारी
जायदाद उसके पैरों पर रख दूँगा। लँगोटी बॉँध कर घर से निकल जाऊँगा; मगर मेरा कैलाश, मेरा प्यारा कैलाश उठ बैठे। ईश्वर के
लिए किसी को बुलवाइए।
एक
महाशय का किसी झाड़ने वाले से परिचय था। वह दौड़कर उसे बुला लाये; मगर कैलाश की सूरत देखकर उसे मंत्र
चलाने की हिम्मत न पड़ी। बोला—अब क्या हो सकता है, सरकार? जो
कुछ होना था, हो चुका?
अरे
मूर्ख, यह क्यों नही कहता कि
जो कुछ न होना था, वह कहॉँ हुआ? मॉँ-बाप ने बेटे का सेहरा कहॉँ देखा? मृणालिनी का कामना-तरू क्या पल्लव और
पुष्प से रंजित हो उठा? मन के वह
स्वर्ण-स्वप्न जिनसे जीवन आनंद का स्रोत बना हुआ था, क्या
पूरे हो गये? जीवन के नृत्यमय तारिका-मंडित
सागर में आमोद की बहार लूटते हुए क्या उनकी नौका जलमग्न नहीं हो गयी? जो न होना था, वह हो गया।
वही
हरा-भरा मैदान था, वही सुनहरी चॉँदनी एक
नि:शब्द संगीत की भॉँति प्रकृति पर छायी हुई थी; वही
मित्र-समाज था। वही मनोरंजन के सामान थे। मगर जहाँ हास्य की ध्वनि थी, वहॉँ करूण क्रन्दन और अश्रु-प्रवाह था।
3
श
|
हर से कई मील दूर एक छोट-से घर में एक
बूढ़ा और बुढ़िया अगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। बूढ़ा नारियल पीता
था और बीच-बीच में खॉँसता था। बुढ़िया दोनों घुटनियों में सिर डाले आग की ओर ताक
रही थी। एक मिट्टी के तेल की कुप्पी ताक पर जल रही थी। घर में न चारपाई थी, न बिछौना। एक किनारे थोड़ी-सी पुआल पड़ी
हुई थी। इसी कोठरी में एक चूल्हा था। बुढ़िया दिन-भर उपले और सूखी लकड़ियॉँ बटोरती
थी। बूढ़ा रस्सी बट कर बाजार में बेच आता था। यही उनकी जीविका थी। उन्हें न किसी
ने रोते देखा, न हँसते। उनका सारा
समय जीवित रहने में कट जाता था। मौत द्वार पर खड़ी थी, रोने या हँसने की कहॉँ फुरसत! बुढ़िया
ने पूछा—कल के लिए सन तो है
नहीं, काम क्या करोंगे?
‘जा कर झगडू साह से दस सेर सन उधार
लाऊँगा?’
‘उसके पहले के पैसे तो
दिये ही नहीं, और उधार कैसे देगा?’
‘न देगा न सही। घास तो कहीं नहीं गयी।
दोपहर तक क्या दो आने की भी न काटूँगा?’
इतने
में एक आदमी ने द्वार पर आवाज दी—भगत, भगत,
क्या
सो गये? जरा किवाड़ खोलो।
भगत
ने उठकर किवाड़ खोल दिये। एक आदमी ने अन्दर आकर कहा—कुछ
सुना, डाक्टर चड्ढा बाबू के
लड़के को सॉँप ने काट लिया।
भगत
ने चौंक कर कहा—चड्ढा बाबू के लड़के
को! वही चड्ढा बाबू हैं न, जो छावनी में बँगले
में रहते हैं?
‘हॉँ-हॉँ वही। शहर में हल्ला मचा हुआ है।
जाते हो तो जाओं, आदमी बन जाओंगे।‘
बूढ़े
ने कठोर भाव से सिर हिला कर कहा—मैं नहीं जाता! मेरी
बला जाय! वही चड्ढा है। खूब जानता हूँ। भैया लेकर उन्हीं के पास गया था। खेलने जा
रहे थे। पैरों पर गिर पड़ा कि एक नजर देख लीजिए; मगर
सीधे मुँह से बात तक न की। भगवान बैठे सुन रहे थे। अब जान पड़ेगा कि बेटे का गम
कैसा होता है। कई लड़के हैं।
‘नहीं जी, यही
तो एक लड़का था। सुना है, सबने जवाब दे दिया
है।‘
‘भगवान बड़ा कारसाज है। उस बखत मेरी
ऑंखें से ऑंसू निकल पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी
दया न आयी थी। मैं तो उनके द्वार पर होता, तो भी बात न पूछता।‘
‘तो न जाओगे? हमने जो सुना था, सो कह दिया।‘
‘अच्छा किया—अच्छा किया। कलेजा ठंडा हो गया, ऑंखें ठंडी हो गयीं। लड़का भी ठंडा हो
गया होगा! तुम जाओ। आज चैन की नींद सोऊँगा। (बुढ़िया से) जरा तम्बाकू ले ले! एक
चिलम और पीऊँगा। अब मालूम होगा लाला को! सारी साहबी निकल जायगी, हमारा क्या बिगड़ा। लड़के के मर जाने से
कुछ राज तो नहीं चला गया? जहॉँ छ: बच्चे गये थे, वहॉँ एक और चला गया, तुम्हारा तो राज सुना हो जायगा। उसी के
वास्ते सबका गला दबा-दबा कर जोड़ा था न। अब क्या करोंगे? एक बार देखने जाऊँगा; पर कुछ दिन बाद मिजाज का हाल पूछूँगा।‘
आदमी
चला गया। भगत ने किवाड़ बन्द कर लिये, तब चिलम पर तम्बाखू
रख कर पीने लगा।
बुढ़िया
ने कहा—इतनी रात गए
जाड़े-पाले में कौन जायगा?
‘अरे,
दोपहर
ही होता तो मैं न जाता। सवारी दरवाजे पर लेने आती, तो
भी न जाता। भूल नहीं गया हूँ। पन्ना की सूरत ऑंखों में फिर रही है। इस निर्दयी ने
उसे एक नजर देखा तक नहीं। क्या मैं न जानता था कि वह न बचेगा? खूब जानता था। चड्ढा भगवान नहीं थे, कि उनके एक निगाहदेख लेने से अमृत बरस
जाता। नहीं, खाली मन की दौड़ थी।
अब किसी दिन जाऊँगा और कहूँगा—क्यों साहब, कहिए, क्या
रंग है? दुनिया बुरा कहेगी, कहे;
कोई
परवाह नहीं। छोटे आदमियों में तो सब ऐव हें। बड़ो में कोई ऐब नहीं होता, देवता होते हैं।‘
भगत
के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो। अस्सी
वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सॉँप की खबर पाकर वह दौड़ न गया हो। माघ-पूस
की अँधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और
लू, सावन-भादों की चढ़ी
हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी
परवाह न की। वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में
आया नहीं। यह सा काम ही न था। जान का मूल्य कोन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था। सैकड़ों निराशों
को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था; पर आप वह घर से कदम
नहीं निकाल सका। यह खबर सुन कर सोने जा रहा है।
बुढ़िया
ने कहा—तमाखू अँगीठी के पास
रखी हुई है। उसके भी आज ढाई पैसे हो गये। देती ही न थी।
बुढ़िया
यह कह कर लेटी। बूढ़े ने कुप्पी बुझायी, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया। अन्त को लेट गया; पर यह खबर उसके हृदय पर बोझे की भॉँति
रखी हुई थी। उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज खो गयी
है, जैसे सारे कपड़े गीले
हो गये है या पैरों में कीचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में
बैठा हुआ उसे घर से लिकालने के लिए कुरेद रहा है। बुढ़िया जरा देर में खर्राटे
लेनी लगी। बूढ़े बातें करते-करते सोते है और जरा-सा खटा होते ही जागते हैं। तब भगत
उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले।
बुढ़िया
ने पूछा—कहॉँ जाते हो?
‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है।‘
‘अभी बहुत रात है, सो जाओ।‘
‘नींद, नहीं
आतीं।’
‘नींद काहे आवेगी? मन तो चड़ढा के घर पर लगा हुआ है।‘
‘चड़ढा ने मेरे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहॉँ जाऊँ? वह आ कर पैरों पड़े, तो भी न जाऊँ।‘
‘उठे तो तुम इसी इरादे से ही?’
‘नहीं री, ऐसा
पागल नहीं हूँ कि जो मुझे कॉँटे बोये, उसके लिए फूल बोता
फिरूँ।‘
बुढ़िया
फिर सो गयी। भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठा। पर उसके मन की कुछ ऐसी दशा थी, जो बाजे की आवाज कान में पड़ते ही
उपदेश सुनने वालों की होती हैं। ऑंखें चाहे उपेदेशक की ओर हों; पर कान बाजे ही की ओर होते हैं। दिल में
भी बापे की ध्वनि गूँजती रहती हे। शर्म के मारे जगह से नहीं उठता। निर्दयी
प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था, पर हृदय उस अभागे
युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था।
उसने
फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि
बुढ़िया को खबर भी न हुई। बाहर निकल आया। उसी वक्त गॉँव को चौकीदार गश्त लगा रहा
था, बोला—कैसे उठे भगत? आज तो बड़ी सरदी है! कहीं जा रहे हो
क्या?
भगत
ने कहा—नहीं जी, जाऊँगा कहॉँ! देखता था, अभी कितनी रात है। भला, के बजे होंगे।
चौकीदार
बोला—एक बजा होगा और क्या, अभी थाने से आ रहा था, तो डाक्टर चड़ढा बाबू के बॅगले पर बड़ी
भड़ लगी हुई थी। उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लियाहै। चाहे मर भी गया हो।
तुम चले जाओं तो साइत बच जाय। सुना है, इस हजार तक देने को
तैयार हैं।
भगत—मैं तो न जाऊँ चाहे वह दस लाख भी दें।
मुझे दस हजार या दस लाखे लेकर करना क्या हैं?
कल
मर जाऊँगा, फिर कौन भोगनेवाला
बैठा हुआ है।
चौकीदार
चला गया। भगत ने आगे पैर बढ़ाया। जैसे नशे में आदमी की देह अपने काबू में नहीं
रहती, पैर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ हे, जबान से निकलता कुछ है, वही हाल इस समय भगत का था। मन में
प्रतिकार था; पर कर्म मन के अधीन न
था। जिसने कभी तलवार नहीं चलायी, वह इरादा करने पर भी
तलवार नहीं चला सकता। उसके हाथ कॉँपते हैं, उठते ही नहीं।
भगत
लाठी खट-खट करता लपका चला जाता था। चेतना रोकती थी, पर
उपचेतना ठेलती थी। सेवक स्वामी पर हावी था।
आधी
राह निकल जाने के बाद सहसा भगत रूक गया। हिंसा ने क्रिया पर विजय पायी—मै यों ही इतनी दूर चला आया। इस
जाड़े-पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी? आराम से सोया क्यों
नहीं? नींद न आती, न सही; दो-चार
भजन ही गाता। व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया। चड़ढा का लड़का रहे या मरे, मेरी कला से। मेरे साथ उन्होंने ऐसा
कौन-सा सलूक किया था कि मै उनके लिए मरूँ? दुनिया में हजारों
मरते हें, हजारों जीते हें।
मुझे किसी के मरने-जीने से मतलब!
मगर
उपचेतन ने अब एक दूसर रूप धारण किया, जो हिंसा से
बहुत कुछ मिलता-जुलता था—वह झाड़-फूँक करने नहीं जा रहा है; वह देखेगा, कि लोग क्या कर रहे हें। डाक्टर साहब का
रोना-पीटना देखेगा, किस तरह सिर पीटते
हें, किस तरह पछाड़े खाते
है! वे लोग तो विद्वान होते हैं, सबर कर जाते होंगे!
हिंसा-भाव को यों धीरज देता हुआ वह फिर आगे बढ़ा।
इतने
में दो आदमी आते दिखायी दिये। दोनों बाते करते चले आ रहे थे—चड़ढा बाबू का घर उजड़ गया, वही तो एक लड़का था। भगत के कान में यह
आवाज पड़ी। उसकी चाल और भी तेज हो गयी। थकान के मारे पॉँव न उठते थे। शिरोभाग इतना
बढ़ा जाता था, मानों अब मुँह के बल
गिर पड़ेगा। इस तरह वह कोई दस मिनट चला होगा कि डाक्टर साहब का बँगला नजर आया।
बिजली की बत्तियॉँ जल रही थीं; मगर सन्नाटा छाया हुआ
था। रोने-पीटने के आवाज भी न आती थी। भगत का कलेजा धक-धक करने लगा। कहीं मुझे बहुत
देर तो नहीं हो गयी? वह दौड़ने लगा। अपनी
उम्र में वह इतना तेज कभी न दौड़ा था। बस, यही मालूम होता था, मानो उसके पीछे मोत दौड़ी आ री है।
4
दो
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बज गये थे। मेहमान विदा हो गये। रोने वालों में
केवल आकाश के तारे रह गये थे। और सभी रो-रो कर थक गये थे। बड़ी उत्सुकता के साथ
लोग रह-रह आकाश की ओर देखते थे कि किसी तरह सुहि हो और लाश गंगा की गोद में दी
जाय।
सहसा
भगत ने द्वार पर पहुँच कर आवाज दी। डाक्टर साहब समझे, कोई मरीज आया होगा। किसी और दिन
उन्होंने उस आदमी को दुत्कार दिया होता; मगर आज बाहर निकल
आये। देखा एक बूढ़ा आदमी खड़ा है—कमर झुकी हुई, पोपला मुँह, भौहे
तक सफेद हो गयी थीं। लकड़ी के सहारे कॉँप रहा था। बड़ी नम्रता से बोले—क्या है भई, आज तो हमारे ऊपर ऐसी मुसीबत पड़ गयी है
कि कुछ कहते नहीं बनता, फिर कभी आना। इधर एक
महीना तक तो शायद मै किसी भी मरीज को न देख सकूँगा।
भगत
ने कहा—सुन चुका हूँ बाबू जी, इसीलिए आया हूँ। भैया कहॉँ है? जरा मुझे दिखा दीजिए। भगवान बड़ा कारसाज
है, मुरदे को भी जिला
सकता है। कौन जाने, अब भी उसे दया आ जाय।
चड़ढा
ने व्यथित स्वर से कहा—चलो, देख लो; मगर
तीन-चार घंटे हो गये। जो कुछ होना था, हो चुका। बहुतेर
झाड़ने-फँकने वाले देख-देख कर चले गये।
डाक्टर
साहब को आशा तो क्या होती। हॉँ बूढे पर दया आ गयी। अन्दर ले गये। भगत ने लाश को एक
मिनट तक देखा। तब मुस्करा कर बोला—अभी कुछ नहीं बिगड़ा
है, बाबू जी! यह नारायण
चाहेंगे, तो आध घंटे में भैया
उठ बैठेगे। आप नाहक दिल छोटा कर रहे है। जरा कहारों से कहिए, पानी तो भरें।
कहारों
ने पानी भर-भर कर कैलाश को नहलाना शुरू कियां पाइप बन्द हो गया था। कहारों की
संख्या अधिक न थी, इसलिए मेहमानों ने
अहाते के बाहर के कुऍं से पानी भर-भर कर कहानों को दिया, मृणालिनी कलासा लिए पानी ला रही थी।
बुढ़ा भगत खड़ा मुस्करा-मुस्करा कर मंत्र पढ़ रहा था, मानो विजय उसके सामने खड़ी है। जब एक
बार मंत्र समाप्त हो जाता, वब वह एक जड़ी कैलाश के सिर पर डाले गये
और न-जाने कितनी बार भगत ने मंत्र फूँका। आखिर जब उषा ने अपनी लाल-लाल ऑंखें खोलीं
तो केलाश की भी लाल-लाल ऑंखें खुल गयी। एक क्षण में उसने अंगड़ाई ली और पानी पीने
को मॉँगा। डाक्टर चड़ढा ने दौड़ कर नारायणी को गले लगा लिया। नारायणी दौड़कर भगत
के पैरों पर गिर पड़ी और म़णालिनी कैलाश के सामने ऑंखों में ऑंसू-भरे पूछने लगी—अब कैसी तबियत है!
एक
क्षण् में चारों तरफ खबर फैल गयी। मित्रगण मुबारकवाद देने आने लगे। डाक्टर साहब
बड़े श्रद्धा-भाव से हर एक के हसामने भगत का यश गाते फिरते थे। सभी लोग भगत के
दर्शनों के लिए उत्सुक हो उठे; मगर अन्दर जा कर देखा, तो भगत का कहीं पता न था। नौकरों ने कहा—अभी तो यहीं बैठे चिलम पी रहे थे। हम
लोग तमाखू देने लगे, तो नहीं ली, अपने पास से तमाखू निकाल कर भरी।
यहॉँ
तो भगत की चारों ओर तलाश होने लगी, और भगत लपका हुआ घर
चला जा रहा था कि बुढ़िया के उठने से पहले पहुँच जाऊँ!
जब
मेहमान लोग चले गये, तो डाक्टर साहब ने
नारायणी से कहा—बुड़ढा न-जाने कहाँ
चला गया। एक चिलम तमाखू का भी रवादार न हुआ।
नारायणी—मैंने तो सोचा था, इसे कोई बड़ी रकम दूँगी।
चड़ढा—रात को तो मैंने नहीं पहचाना, पर जरा साफ हो जाने पर पहचान गया। एक
बार यह एक मरीज को लेकर आया था। मुझे अब याद आता हे कि मै खेलने जा रहा था और मरीज
को देखने से इनकार कर दिया था। आप उस दिन की बात याद करके मुझें जितनी ग्लानि हो
रही है, उसे प्रकट नहीं कर
सकता। मैं उसे अब खोज निकालूँगा और उसके पेरों पर गिर कर अपना अपराध क्षमा
कराऊँगा। वह कुछ लेगा नहीं, यह जानता हूँ, उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिए
हुआ है। उसकी सज्जनता ने मुझे ऐसा आदर्श दिखा दिया है, जो अब से जीवनपर्यन्त मेरे सामने रहेगा।
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