Wednesday, November 7, 2012

राधा-कृष्ण-प्रथम मिलन-By Soor Das


राधा-कृष्ण-प्रथम मिलन
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खेलत हरि निकसै ब्रज-खोरी
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा,चक, डोरी
मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि बर, बसन-दमक दामिनि-छबि छोरी
गए स्याम रबि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिये रोरी
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी
संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी
सूर स्याम देखत हीं रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी 1

           
बूझत स्याम कौन तू गौरी
कहाँ रहति,काकी है बेटी, देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी
काहे कौं हम ब्रज-तन आवतिं, खेलति रहतिं आपनी पौरी
सुनत रहतिं स्रवन नँद-ढोटा, करत फिरत माखन-दधि-चोरी
तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैं, लेखन चलौ संग मिलि जोरी
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी 2

       
प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ
नैन नैन कीन्ही सब बातें, गुप्त प्रीति प्रगटान्यौ
खेलन कबहुँ हमरै आवहु,नंद-सदन, ब्रज गाउँ
द्वारैं आइ टेरि मोहिं लीजौ, कान्ह हमारौ नाउँ
जौ कहियै घर दूरि तुम्हारौ, बोलत सुनियै टेरि
तुमहिं सौंह बृषभानु बबा की, प्रात-साँझ इक फेरि
सूधी निपट देखियत तुमकौं, तातैं करियत साथ
सूर स्याम नागर-उत नागरि, राधा दोउ मिलि गाथ 3

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