उद्धव संदेश
अंतरजामी कुंवर कन्हाई ।
गुरु गृह पढ़त हुते जहँ विद्या, तहँ ब्रज-बासिनि की सुधि आई ॥
गुरु सौं कह्यौ जोरि कर दोऊ, दछिना कहौ सो देउँ मँगाई ।
गुरु-पतनी कह्यौ पुत्र हमारे, मृतक भये सो देहु जिवाई ॥
आनि दिए गुरु-सुत जमपुर तैं, तब गुरुदेव असीस सुनाई ।
सूरदास प्रभु आइ मधुपुरी, ऊधौ कौं ब्रज दियौ पठाई ॥1॥
जदुपति जानि उद्धव रीति ।
जिहिं प्रगट निज सखा कहियत, करत भाव अनीति ॥
बिरह दुख जहँ नाहिं-नैकहूँ, तहँ न उपजै प्रेम ।
रेख, रूप न बरन जाकैं, इहिं धर्यौ वह नेम ॥
त्रिगुन तन करि लखत हमकौं, ब्रह्म मानत और ।
बिना गुना क्यौं पुहुमि उघरै, यह करत मन डौर ॥
बिरस रस के मंत्र कहुऐ, क्यौ, चलै संसार ।
कछु कहत यह एक प्रगटत, अति भर्यौ अहंकार ॥
प्रेम भजन न नैंकु याकौं, जाइ क्यौं समुझाइ ।
सूर प्रभु मन यहै आनी, ब्रजहिं देउँ पठाइ ॥2॥
संग मिलि कहौं कासौं बात ।
यह तौ कहत जोग की बातैं, जामै रस जरि जात ॥
कहत कहा पितु मातु कौन के, पुरुष नारि कह नात ।
कहाँ जसोदा सी है मैया, कहाँ नंद सम तात ॥
कहँ बृषभान-सुता सँग कौ सुख, वह बासर वह प्रात ।
सखी सखा सुख नहिं त्रिभुवन मैं, नहिं बैकुंठ सुहात ॥
वै बातें कहियै किहिं आगै, यह गुनि हरि पछितात ।
सूरदास प्रभु ब्रज महिमा कहि, लिकी बदत बल ब्रात ॥3॥
तबहिं उपंग-सुत आइ गए ।
सखा सखा कछु अंतर नाहीं, भरि भरि अंक लए ॥
अति सुन्दर तन स्याम सरीखो, देखत हरि पछिताने ।
ऐसे कैं वैसी बुधि होती, ब्रज पठऊँ मन आने ॥
या आगैं रस-कथा प्रकासौं, जोग-कथा प्रगटाऊँ ।
सूर ज्ञान याकौ दृढ़ करिकै, जुवतिन्ह पास पठाऊँ ॥4॥

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