उद्धव संदेश-Part-2,
हरि गोकुल की प्रीति चलाई ।
सुनहु उपँग-सुत मोहि न बिसरत, ब्रज बासी सुखदाई ॥
यह चित होत जाऊँ मैं अबहीं, इहाँ नहीं मन लागत ।
गोपी ग्वाल गाइ बन चारन, अति दुख पायौ त्यागत ॥
कहँ माखन-रोटी, कहँ जहँ जसुमति, जेंवहु कहि-कहि प्रेम ।
सूर स्याम के बचन हँसत सुनि, थापत अपनौ नेम ॥5॥
जदुपति लख्यौ तिहिं मुसुकात ।
कहत हम मन रही जोई, भई सोई बात ॥
बचन परगट करन कारन, प्रेम कथा चलाई ।
सुनहु ऊधौ मोहिं ब्रज की, सुधि नहीं बिसराइ ॥
रैनि सोवत दिवस जागत, नाहिं नै मन आन ।
नंद-जसुमति, नारि-नर-ब्रज तहाँ मेरौ प्रान ॥
कहत हरि सुनि उपँग सुत यह, कहत हौम रस रीति ।
सूर चित तैं टरति नाहीं, राधिका की प्रीति ॥6॥
सखा सुनि एक मेरी बात ।
वह लता गृह संग गोपनि, सुधि करत पछितात ॥
बिधि लिखी नहिं टरत क्यौं हूँ, यह कहत अकुलात ।
हँसि उपँग-सुत बचन बोले, कहा करि पछितात ॥
सदा हित यह रहत नाहीं, सकल मिथ्या जात ।
सूरप्रभु एक यह सुनो मोसौं, एक ही सौं नात ॥7॥
जब ऊधौ यह बात कही ।
तब जदुपति अति ही सुख पायौ, मानी प्रगट सही ।
श्री मुख कह्यौ जाहु तुम ब्रज कौं, मिलहु जाइ ब्रज-लोग ।
मो बिनु, बिरह भरीं ब्रजबाला, जाउ सुनावहु जोग ॥
प्रेम मिटाइ ज्ञान परबोधहु, तुम हौ पूरन ज्ञानी ।
सूर उपंग-सुत मन हरषाने, यह महिमा इन जानी ॥8॥
ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ ।
मन, बच, क्रम, मैं तुमहिं पठावत, ब्रज कौं तुरत पलानौ ॥
पूरन ब्रह्म अकल अविनासी, ताके तुम हौ ज्ञाता ।
रेख न रूप जाति कुल नाहीं, जाके नहिं पितु माता ॥
यह मत दै गोपिनि कौं आवहु, बिरह नदी मैं भासत ।
सूर तुरत तुम जाइ कहौ यह, ब्रह्म बिना नहिं आसत ॥9॥
ऊधौ मन अभिमान बढ़ायो ।
जदुपति जोग जानि जिय साँचौ, नैन अकास चढ़ायौ ॥
नारिनि पै मोकौं पठवत हैं, कहत सिखावन जोग ।
मन ही मन अप करत प्रसंसा, यह मिथ्या सुख-भोग ॥
आयसु मानि लियौ सिर ऊपर, प्रभु आज्ञा परमान ।
सूरदास प्रभु गोकुल पठवत, मैं क्यौं हौं कि आन ॥10॥
तुम पठवत गोकुल कै जैहौं ।
जौ मानिहैं ब्रह्म की बातें, तो उनसौं मै कैहौं ॥
गदगद बचन कहत मन प्रपूलित, बार-बार समझैहौं ।
आजु नहीं जो करौं काज तुव, कौन काज फुनि लैहौं ॥
यह मिथ्या संसार सदाई, यह कहिकै उठि ऐहौं ।
सूर दिना द्वै ब्रज-जन सुख दै, आइ चरन पुनि गैहौं ॥11॥
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