Wednesday, November 7, 2012

उद्धव संदेश-Part-2, from soor sagar


उद्धव संदेश-Part-2,


हरि गोकुल की प्रीति चलाई
सुनहु उपँग-सुत मोहि बिसरत, ब्रज बासी सुखदाई
यह चित होत जाऊँ मैं अबहीं, इहाँ नहीं मन लागत
गोपी ग्वाल गाइ बन चारन, अति दुख पायौ त्यागत
कहँ माखन-रोटी, कहँ जहँ जसुमति, जेंवहु कहि-कहि प्रेम
सूर स्याम के बचन हँसत सुनि, थापत अपनौ नेम 5
  
जदुपति लख्यौ तिहिं मुसुकात
कहत हम मन रही जोई, भई सोई बात
बचन परगट करन कारन, प्रेम कथा चलाई
सुनहु ऊधौ मोहिं ब्रज की, सुधि नहीं बिसराइ
रैनि सोवत दिवस जागत, नाहिं नै मन आन
नंद-जसुमति, नारि-नर-ब्रज तहाँ मेरौ प्रान
कहत हरि सुनि उपँग सुत यह, कहत हौम रस रीति
सूर चित तैं टरति नाहीं, राधिका की प्रीति 6
  
         

सखा सुनि एक मेरी बात
वह लता गृह संग गोपनि, सुधि करत पछितात
बिधि लिखी नहिं टरत क्यौं हूँ, यह कहत अकुलात
हँसि उपँग-सुत बचन बोले, कहा करि पछितात
सदा हित यह रहत नाहीं, सकल मिथ्या जात
सूरप्रभु एक यह सुनो मोसौं, एक ही सौं नात 7
 

जब ऊधौ यह बात कही
तब जदुपति अति ही सुख पायौ, मानी प्रगट सही
श्री मुख कह्यौ जाहु तुम ब्रज कौं, मिलहु जाइ ब्रज-लोग
मो बिनु, बिरह भरीं ब्रजबाला, जाउ सुनावहु जोग
प्रेम मिटाइ ज्ञान परबोधहु, तुम हौ पूरन ज्ञानी
सूर उपंग-सुत मन हरषाने, यह महिमा इन जानी 8
   

ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ
मन, बच, क्रम, मैं तुमहिं पठावत, ब्रज कौं तुरत पलानौ
पूरन ब्रह्म अकल अविनासी, ताके तुम हौ ज्ञाता
रेख रूप जाति कुल नाहीं, जाके नहिं पितु माता
यह मत दै गोपिनि कौं आवहु, बिरह नदी मैं भासत
सूर तुरत तुम जाइ कहौ यह, ब्रह्म बिना नहिं आसत 9
    

ऊधौ मन अभिमान बढ़ायो
जदुपति जोग जानि जिय साँचौ, नैन अकास चढ़ायौ
नारिनि पै मोकौं पठवत हैं, कहत सिखावन जोग
मन ही मन अप करत प्रसंसा, यह मिथ्या सुख-भोग
आयसु मानि लियौ सिर ऊपर, प्रभु आज्ञा परमान
सूरदास प्रभु गोकुल पठवत, मैं क्यौं हौं कि आन 10
     

तुम पठवत गोकुल कै जैहौं
जौ मानिहैं ब्रह्म की बातें, तो उनसौं मै कैहौं
गदगद बचन कहत मन प्रपूलित, बार-बार समझैहौं
आजु नहीं जो करौं काज तुव, कौन काज फुनि लैहौं
यह मिथ्या संसार सदाई, यह कहिकै उठि ऐहौं
सूर दिना द्वै ब्रज-जन सुख दै, आइ चरन पुनि गैहौं 11

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